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विश्व मानव कल्याण ट्रस्ट

🌅 #फाल्गुनमास में #विष्णु #सूर्य का #ध्यान 🌅

#विष्णुरश्वतरो #रम्भा #सुर्यवर्चाश्र्च #सत्यजित् l
#विश्वामित्रो #महाप्रेत #उर्जमासं #नयन्त्यमी l l
#भानुमण्डलमध्यस्थं #वेदत्रयनिषेवितम् l #गायत्रीप्रतिपाद्यं #तं #विष्णुं #भक्त्या #नमाम्यहम् l l

फाल्गुन मास में (आदित्य )सूर्य के साथ उनके रथ पर विश्र्वामित्र ऋषि,रम्भा अप्सरा,सुर्यवाचां गन्धर्व,सत्यजित यक्ष,अश्र्वतर नाग तथा महाप्रेत राक्षस रहते हैं l ऐसे भानुमण्डलके मध्य में स्थित,तीनों वेदोंद्वारा सेवित तथा गायत्रीद्वारा प्रतिपाद्य विष्णु आदित्य् को मैं भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ l विष्णु आदित्य छः सहस्त्र रश्मियों से तपते हैं,उनका वर्ण अरुण है l फाल्गुनके सूर्य का नाम हैं --विष्णु l पराशरजी के अनुसार विष्णु का अर्थ है --रक्षक,विश्वव्यापक l यह सम्पूर्ण विश्व उन परमात्मा की शक्ति से व्याप्त है;अतः वे विष्णु कहलाते हैं,क्यों कि विश धातु का अर्थ है --प्रवेश करना l फाल्गुन मास में पहुँचते-पहुँचते सूर्य शक्तिसम्पन्न होजाते हैं l वह ठण्डसे सिकुड़ी हुई सृष्टिमें शक्ति का संचार करते हैं l उनकी उत्पादक शक्ति प्रखर होजाती है l इस प्रकार एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति की भाँति विष्णु आदित्य सृष्टिके पालन की भूमिका को सम्पन्न करते हैं l देवताओं के शत्रुओं का संहार करने वाले तथा समस्त सृष्टिका पालन करने वाले भगवान विष्णु वास्तवमें सूर्यके ही अवतार हैं l इन्हें ही द्वादशादित्यों में विष्णु कहा जाता है l

जो मनुष्य फाल्गुन मास में भगवान विष्णु रूप सूर्य₹ का पूजा-अर्चना अथवा स्त्रोत्र का पाठ करता है उसे अनेकानेक लाभ प्राप्त होते हैं l जय भगवान भास्कर l
. 💗 #सूर्याष्टकं 💗
" आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर l दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोस्तुते ll
सप्ताश्र्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् l श्र्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
लोहितं रथमारुढं सर्वलोकपितामहम् l महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् l महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
बृंहितं तेजः पुञ्जं च वायुमाकाशमेव च l
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् l एकचक्रधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
तं सूर्य जगतकर्तारं महातेजः प्रदीपनम् l महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
तं सूर्य जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् l महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
इति श्री शिवप्रोक्तं सूर्याष्टकं सम्पुर्णम् "

. #पँ०हिमांशु #मिश्र,
. 7739792520.
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. 🕉 #आदित्यहृदय #स्तोत्र 🕉

. 🌺 #विनियोग 🌺
ॐ अस्य आदित्यह्रदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषि: अनुष्टुप्छन्दः आदित्यह्रदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः !!

. 🔔 #पूर्व #पिठिता 🔔

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ ।
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ ।
येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ ।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥

सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥

. 🍀 #मूल -#स्तोत्र 🍀
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ ।
पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: ।
एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: ।
महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: ।
वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥

आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥

हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥

हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥

आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:।
कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥

नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: ।
नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: ।
नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥

नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ ।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥

अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।
एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥ धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ ।
त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ ।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥

. 🌷 #अथ 🌷 रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।

निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥

. ।। #सम्पूर्ण ।।

. : = #अनुवाद = :

{ 1,2 .} उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिंता करते हुए रणभूमि में खड़े हुए थे । इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया । यह देख भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले ।

{ 3 }सबके ह्रदय में रमन करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो ! वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे ।

{ 4,5 } इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है ‘आदित्यहृदय’ । यह परम पवित्र और संपूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है । इसके जप से सदा विजय कि प्राप्ति होती है । यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है । सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है । इससे सब पापों का नाश हो जाता है । यह चिंता और शोक को मिटाने तथा आयु का बढ़ाने वाला उत्तम साधन है ।

{ 6 } भगवान् सूर्य अपनी अनंत किरणों से सुशोभित हैं । ये नित्य उदय होने वाले, देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान नाम से प्रसिद्द, प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी हैं । तुम इनका रश्मिमंते नमः, समुद्यन्ते नमः, देवासुरनमस्कृताये नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराये नमः इन मन्त्रों के द्वारा पूजन करो।

{ 7 } संपूर्ण देवता इन्ही के स्वरुप हैं । ये तेज़ की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं । ये अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित समस्त लोकों का पालन करने वाले हैं ।

8,9 ये ही ब्रह्मा, विष्णु शिव, स्कन्द, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर , वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रकाश के पुंज हैं ।

10,11,12,13,14,15 इनके नाम हैं आदित्य(अदितिपुत्र), सविता(जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य(सर्वव्यापक), खग, पूषा(पोषण करने वाले), गभस्तिमान (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश्य, भानु(प्रकाशक), हिरण्यरेता(ब्रह्मांड कि उत्पत्ति के बीज), दिवाकर(रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व, सहस्रार्चि(हज़ारों किरणों से सुशोभित), सप्तसप्ति(सात घोड़ों वाले), मरीचिमान(किरणों से सुशोभित), तिमिरोमंथन(अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू, त्वष्टा, मार्तण्डक(ब्रह्माण्ड को जीवन प्रदान करने वाले), अंशुमान, हिरण्यगर्भ(ब्रह्मा), शिशिर(स्वभाव से ही सुख प्रदान करने वाले), तपन(गर्मी पैदा करने वाले), अहस्कर, रवि, अग्निगर्भ(अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख, शिशिरनाशन(शीत का नाश करने वाले), व्योमनाथ(आकाश के स्वामी), तमभेदी, ऋग, यजु और सामवेद के पारगामी, धनवृष्टि, अपाम मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विंध्यवीथिप्लवंगम (आकाश में तीव्र वेग से चलने वाले), आतपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल(भूरे रंग वाले), सर्वतापन(सबको ताप देने वाले), कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्ति के कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन(जगत कि रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी और द्वादशात्मा हैं। इन सभी नामो से प्रसिद्द सूर्यदेव ! आपको नमस्कार है

{ 16 } पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है । ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है ।

{ 17 } आप जयस्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता हैं । आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं । आपको बारबार नमस्कार है । सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्य ! आपको बारम्बार प्रणाम है । आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से भी प्रसिद्द हैं, आपको नमस्कार है ।

{ 18 } उग्र, वीर, और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है । कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तण्ड को प्रणाम है ।

{19 } आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी है । सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाली अग्नि आपका ही स्वरुप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है ।

{ 20 } आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं । आपका स्वरुप अप्रमेय है । आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, संपूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है ।

{ 21 } आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरी और विश्वकर्मा हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है

{ 22 } रघुनन्दन ! ये भगवान् सूर्य ही संपूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं । ये अपनी किरणों से गर्मी पहुंचाते और वर्षा करते हैं ।

{ 23 } ये सब भूतों में अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं । ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं ।

{ 24 } देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं । संपूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं ।

{ 25} राघव ! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता ।

{ 26 } इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर कि पूजा करो । इस आदित्यहृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे ।

{ 27 } महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे । यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे वैसे ही चले गए ।
28,29,30 उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया । उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान् सूर्य की और देखते हुए इसका तीन बार जप किया । इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ । फिर परम पराक्रमी रघुनाथ जी ने धनुष उठाकर रावण की और देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढे । उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया ।

{31} उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान् सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की और देखा और निशाचरराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा – ‘रघुनन्दन ! अब जल्दी करो’ ।

इस प्रकार #भगवान्सूर्य कि प्रशंसा में कहा गया और #वाल्मीकि #रामायण #के #युद्ध #काण्ड #में #वर्णित #यह #आदित्य #हृदयम #मंत्र #संपन्न #होता #है ।।
जो मनुष्य द्वादश रविबार को इस मंदिर में #सूर्याआदित्यहृदयस्तोत्र
का पाठ करता है उन्हें #रोग-#दुःख , #क्लेश तथा #अनेको #कष्टों से छूट कर इस लोक में अनेक सुखों की प्राप्ति उपरान्त सूर्यलोक में #मोक्ष की #प्राप्ति होती है ।
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. #देव #सूर्यमन्दिर-#औरँगाबाद,
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🌅 #स्तवराज #मन्त्र 🌄

#भगवानसूर्य #ने #श्रीकृष्ण #पुत्र #साम्ब #को #अपने 21 #नाम #बताये #जो ‘#स्तवराज’ के #नाम से भी #जाने #जाते हैं–

ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रवि:।
लोकप्रकाशक: श्रीमान् लोकचक्षुर्महेश्वर:।।
लोकसाक्षी त्रिलोकेश: कर्ता हर्ता तमिस्त्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचि: सप्ताश्ववाहन:।।
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृत:।। ( *भविष्यपुराण* )

#भगवानसूर्य के ये 21 #नाम हैं–*
विकर्तन (विपत्तियों को नष्ट करने वाला)विवस्वान् (प्रकाशरूप)मार्तण्डभास्कररविलोकप्रकाशकश्रीमान्लोकचक्षुग्रहेश्वरलोकसाक्षीत्रिलोकेशकर्ताहर्तातमिस्त्रहा (अन्धकार को नष्ट करने वाले)तपनतापनशुचि (पवित्रतम)सप्ताश्ववाहन (जिनका वाहन सात घोड़ों वाला रथ है)गभस्तिहस्त (किरणें ही जिनके हाथ हैं)ब्रह्मासर्वदेवनमस्कृत।

भगवान सूर्य के आदेश से साम्ब इक्कीस नामों का पाठ करने लगे। उनकी भक्ति और तप से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उनका रोग दूर कर दिव्य रूप प्रदान किया।

जो मानव प्रत्येक दिन उपरोक्त मन्त्र का पाठ करेगा,उसे रोग,शोक,दुःख एवं अनेक कष्टों से मुक्ति प्राप्त हो जाएगी ।
. *जय भाष्कर*
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🌅 #हड़िया #सूर्य #मंदिर 🌅

सिर्फ नहाने से मिलती है कुष्ठ से मुक्ति, श्रीकृष्ण के बेटे ने बनवाया था सूर्यमंदिर नवादा (बिहार). देश के प्रसिद्ध सूर्य मंदिरों में ज्यादातर सूर्य मंदिर बिहार में हैं। #बिहार के #नवादा जिले के #नारदीगंज #प्रखंड के #हड़िया #सूर्य #मंदिर को उसी श्रृंखला की एक कड़ी माना जाता है। हड़िया को #द्वापरयुगीन #सूर्य #मंदिर माना जाता है। मंदिर और उसके आसपास पुरातात्विक महत्व की कई चीजें हैं, जो मंदिर की गौरवशाली अतीत को बयां करती हैं। छठ पूजा पर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, इस मौके पर हम आपको बता रहे हैं इस सूर्य मंदिर के बारे में।

नवादा (बिहार). #देश के #प्रसिद्ध #सूर्य #मंदिरों में #ज्यादातर सूर्य मंदिर #बिहार में हैं। बिहार के नवादा जिले के #नारदीगंज #प्रखंड के हड़िया सूर्य मंदिर को उसी श्रृंखला की एक कड़ी माना जाता है। हड़िया को #द्वापरयुगीन #सूर्य #मंदिर #माना जाता है। मंदिर और उसके आसपास #पुरातात्विक #महत्व की कई चीजें हैं, जो मंदिर की गौरवशाली अतीत को बयां करती हैं। छठ पूजा पर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, इस मौके पर हम आपको बता रहे हैं इस सूर्य मंदिर के बारे में।

यहां सूर्य नारायण की दुर्लभ मूर्ति और प्राचीन सरोवर है। श्रद्धालु इसी सरोवर में स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं। हड़िया सूर्य मंदिर #कुष्ठ से #मुक्ति के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि #पांच #रविवार तालाब में स्नान करने से असाध्य कुष्ठ रोग से भी लोगों को छुटकारा मिल जाता है।

वैसे तो, यहां सालों भर लोग आते-जाते रहते हैं, लेकिन छठ के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। दक्षिण बिहार के अलावा सीमावर्ती झारखंड और पश्चिम बंगाल के श्रद्धालु भी पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। बताया जाता है कि आम दिनों में गैर हिन्दू भी कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिए तालाब में स्नान के लिए पहुंचते हैं। यह सामाजिक सद्भाव का भी मिसाल है।
*क्या है धार्मिक मान्यता*
धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को गोपियों ने भ्रमवश श्रीकृष्ण मान लिया था। साम्ब ने गोपियों को अपनी पहचान बताने के बजाय गोपियों की लीला में शरीक हुए थे। इसके बाद श्रीकृष्ण ने श्राप दे दिया था, जिसके बाद साम्ब कुष्ठ रोगी हो गए थे। साम्ब ने जब श्रीकृष्ण से मुक्ति के लिए प्रार्थना की, तब उन्हें बारह सूर्य मंदिरों का निर्माण कराने को कहा गया था। ऐसा माना जाता है कि उन्हीं सूर्य मंदिरों में से हड़िया भी एक है।
क्यों प्रसिद्ध है हड़िया
गया और नालंदा जिलों की सीमा पर हड़िया है। यह राजगीर से पांच किलोमीटर पर है। साहित्यकार रामरतन प्रसाद सिंह रत्नाकर कहते हैं यह श्रीकृष्ण का प्रभाव वाला इलाका रहा है। मगध सम्राट जरासंध का मुख्यालय राजगीर था। हड़िया के आसपास बड़गांव समेत कई प्रमुख सूर्य मंदिर है। जरासंध की बेटी धन्यावती भी राजगीर से हड़िया आती थीं। माना जाता है कि इन्होंने ही धनियावां पहाड़ी पर अवस्थित शिव मंदिर की स्थापना की थी।

. पँ०हिमांशु मिश्र,
. 7739792520
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. " #स्त्री #भगवान #की #माया "

स्त्री भगवान की एक महान कृति है ,विश्व का सार ,पुरूष की प्रिय संगिनी और सहयोगी है l स्त्री चैतन्य माया है l वह भगवान की ऊर्जा है l वह आदि शक्ति की सन्तान है l उसके पास इस विश्व की कुँजी है l वह बच्चों की भाग्य विधात्री है l स्त्री सौम्यता,कोमलता और लालित्य का रहस्यमय मिश्रण है l उसमे सेवा,धैय और प्रेम का अद्भुत संयोग होता है l वह माधुर्य सॆ पूर्ण होती है l वह माया का मोहक आकर्षण और जादू है l वह करुणा और दया की मूर्ति है वह मातृ -प्रेम का मूर्त रूप है l वह क्षमा का सागर है l चाहे वह देवी माँ हो,या मेरी माँ,जहाँ भी माँ की ऊर्जा है,वह सदा प्रेम और दया का मूर्त रूप होगी l उसका सच्चा रूप है क्षमा,संतान चाहे कितनी भी शरारती या दुष्ट हो l वह मातृत्व की महिमा से को प्रकाशित कर देती है l यही देवी माँ का मूल रूप है l
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🌅#भारतीय #उपमहाद्वीप #का #पहला #सूर्यमंदिर #था #मुल्तान #में 🌅

भारतीयउपमहाद्वीपका पहला सूर्य मंदिर मूल स्थान में था। आज #पाकिस्तान में स्थित इस स्थान का नाम #अपभ्रंश होकर #मुल्तान हो गया है। इसका #वर्णन #पुराणों में मिलता है। #ह्वेनसांग ने भी अपनी #लेखनी में इसका #जिक्र किया है। साथ-साथ #कोणार्क से भी इसे जोड़ा है। ऐसी मान्यता है कि #कृष्ण के #पुत्र राजा #शाम्ब को #कुष्ठ हो गया, तो उन्होंने #सूर्य #देव की #आराधना की। इससे उनका कुष्ठ ठीक हो गया। तब शाम्ब ने मुल्तान में पहले सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। #कोणार्क, #पुण्यार्क, #लोलार्क, #देवार्क #आदि #मंदिर भी #शाम्ब ने ही बनवाए थे। ६यह कहना है कला इतिहासविद, पत्रकार रंजन कुमार सिंह का।

बिहार पुराविद् परिषद, पटना द्वारा अभिलेख भवन में आयोजित व्याख्यान का विषय मुल्तान : भारतीय उपमहाद्वीप का प्रथम सूर्य मंदिर था। उन्होंने कहा, भगवान सूर्य का हमारे स्वास्थ्य पूरे जीवन पर गहरा संबंध है, लेकिन मुल्तान के सूर्य मंदिर की प्रतिष्ठा आस्था स्वास्थ्य के साथ-साथ कृषि के चलते थी। पुराण के आख्यानों में वर्णन है कि कभी रावी नदी के बीच टापू की तरह था मुल्तान। अाज चिनाव नदी के तट पर है। मान्यता है कि इसके आसपास के हड़प्पा संस्कृति के शहरों का भरण-पोषण होता था, क्योंकि अन्न उत्पादन का यह प्रमुख केंद्र था। उसी के धन्यवाद के लिए उस समय के लोगों ने सूर्य मंदिर की स्थापना की होगी। कहते हैं कि स्थापत्य कला की दृष्टि से मुल्तान का मंदिर बेजोड़ था। उन्होंने औरंगाबाद के देव सूर्य मंदिर और ओड़िशा के कोणार्क सूर्य मंदिर की विशेषताओं पर भी चर्चा की। कार्यक्रम की अध्यक्षता पटना विवि में इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो युवराज देव प्रसाद ने की।

आज रविवार को भगवान आदित्य सूर्य के प्रथम मन्दिर का बर्णन एवं मन्त्र को प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

.💞💞:: सूर्याष्टकं ::💞💞
" आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर l
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोस्तुते ll
सप्ताश्र्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् l
श्र्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
लोहितं रथमारुढं सर्वलोकपितामहम् l
महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् l
महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
बृंहितं तेजः पुञ्जं च वायुमाकाशमेव च l
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् l
एकचक्रधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
तं सूर्य जगतकर्तारं महातेजः प्रदीपनम् l
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तं सूर्य जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् l
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इति श्री शिवप्रोक्तं सूर्याष्टकं सम्पुर्णम् "

. पँ० हिमांशु मिश्र
. राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित
. " समाज सेवी "
. मो०न०-७७३९७९२५२०
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. 🌅 #सूर्य #मन्दिर #औंगारी 🌅

#औंगारी #सूर्यमन्दिर का निर्माण #तीसरी #शताब्दी #ईसा #पूर्व में #करवाया #गया #था। यह मन्दिर बिहार के #नालन्दा जिले के औंगारी नामक स्थान पर स्थित है। एक प्रसिद्ध तालाब के तट पर स्थित यह सूर्य मन्दिर बिहार की कला एवं संस्कृति का परिचायक है। इस मन्दिर की खास विशेषता यह है कि यहाँ मनौती पूर्ण होने की आशा मे श्रद्धालु विशेष मुद्रा में भगवान सूर्य को अर्ध्य देते हैं। यह #बिहार #राज्य के #नालंदा #जिले के #एकंगरसराय #प्रखंड में स्थित है। यहाँ बिहारशरीफ ( नालंदा जिले का मुख्यालय) से३० किमी० #सड़क मार्ग द्वारा तथा #एकंगरसराय से ०५ किमी सड़क मार्ग द्वारा जाया जा सकता है। इस मंदिर की गर्भ गृह #पश्चिममुखी है,जो देश के अन्य सूर्य मंदिरों से इसे विशिष्ट बनाता है
नालंदा का प्रसिद्ध सूर्य धाम औंगारी के सूर्य मंदिर देश भर में प्रसिद्ध हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां के सूर्य तालाब में स्नान कर मंदिर में पूजा करने से #कुष्ठ रोग सहित कई #असाध्य #व्याधियों से #मुक्ति मिलती है। प्रचलित मान्यताओं के कारण यहां छठ व्रत करने बिहार के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि देश भर के श्रद्धालु यहां आते हैं। लोग यहां तम्बू लगा कर सूर्योपासना का चार दिवसीय महापर्व छठ संपन्न करते हैं। कहते है #भगवानकृष्ण के #वंशजसाम्ब #कुष्ठरोग से पीडि़त थे। इसलिए उन्होंने 12 जगहों पर भव्य सूर्य मंदिर बनवाए थे, और भगवान सूर्य की आराधना की थी। ऐसा कहा जाता है तब #साम्ब को #कुष्ठ से #मुक्ति मिली थी। उन्हीं 12 मंदिरों में औंगारी एक है। अन्य सूर्य मंदिरों में देवार्क, लोलार्क, पूण्यार्क, कोणार्क, चाणार्क आदि शामिल है।
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. 💐 #गुरु #का #ज्ञान 💐

#यो #गुरुः #स #शिवः #प्रोक्ता #यः #शिवः #गुरुस्मृतः ।
#विकल्पं #यस्तु #कुर्वीत #स #नरो #गुरुतल्पगः।।

अनुवाद :- जो गुरु है वे ही शिव है, जो शिव है वे ही गुरु है । दोनों में जो अन्तर मानता है वह गुरुपत्नी गमन करने वाले के समान पापी है।

व्याख्या :- गुरु वही होता है जो तत्वज्ञानी है, जो ईश्वरत्व को प्राप्त हो चूका है, जिसे आत्मज्ञान हो चूका है, ईश्वर का साक्षात्कार हो चूका है। ऐसा गुरु शिव तुल्य (ईश्वर तुल्य) ही है तथा जो शिव है वही गुरु रूप है। दोनों में अभेद सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। फिर द्वैत भाव समाप्त हो जाता है। ऐसा गुरु सभी प्रकार की सांसारिक कामनाओ, वासनाओ से ऊपर उठ जाता है। लोभ, मोह, ईर्ष्या, राग, द्वेष आदि का जो पूर्णतया त्याग कर देता है, जो केवल अपनी आत्मा में ही स्थित रह कर उसी से संतुष्ट रहता है तथा उसी में रमण करता है वही सच्चा गुरु हो सकता है। ईश्वर और गुरु में अभेद की प्रतीति ही गुरुत्व का एकमात्र लक्षण है। ऐसे ज्ञानी- गुरु व् ईश्वर (शिव) में जो अंतर देखकर व्यवहार करता है उसे कभी भी गुरु कृपा का प्रसाद नहीं मिल सकता यहाँ तक कि वह घोर पापी है जिसे गुरु पत्नी गमन करने के समान ही पापी माना जाता है। ऐसा व्यक्ति न ज्ञान का ही अधिकारी है, न उसे कभी ज्ञान प्राप्त हो सकता है। ऐसे कुपात्र शिष्य को ज्ञान देने का भी शास्त्रो में निषेद किया गया है ।
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#शिव #तांडव #स्तोत्रं #दशानन #द्वारा #कब #और #क्यों? #कैसे?

पुष्‍पक विमान की ये विशेषता थी कि वह चालक की इच्‍छानुसार चलता था तथा उसकी गति मन की गति से भी तेज थी, इसलिए जब पुष्‍पक विमान की गति मंद हो गर्इ तो दशानन को बडा आश्‍चर्य हुआ। तभी उसकी दृष्टि सामने खडे विशाल और काले शरीर वाले नंदीश्वर पर पडी। नंदीश्वर ने दशानन को चेताया कि-

यहाँ भगवान शंकर क्रीड़ा में मग्न हैं इसलिए तुम लौट जाओ.

लेकिन दशानन कुबेर पर विजय पाकर इतना दंभी होगया था कि वह किसी कि सुनने तक को तैयार नहीं था। उसे उसने कहा कि-

कौन है ये शंकर और किस अधिकार से वह यहाँ क्रीड़ा करता है? मैं उस पर्वत का नामो-निशान ही मिटा दूँगा, जिसने मेरे विमान की गति अवरूद्ध की है।

इतना कहते हुए उसने पर्वत की नींव पर हाथ लगाकर उसे उठाना चाहा। अचानक इस विघ्न से शंकर भगवान विचलित हुए और वहीं बैठे-बैठे अपने पाँव के अंगूठे से उस पर्वत को दबा दिया ताकि वह स्थिर हो जाए। लेकिन भगवान शंकर के ऐसा करने से दशानन की बाँहें उस पर्वत के नीचे दब गई। फलस्‍वरूप क्रोध और जबरदस्‍त पीडा के कारण दशानन ने भीषण चीत्‍कार कर उठा, जिससे ऐसा लगने लगा कि मानो प्रलय हो जाएगा। तब दशानन के मंत्रियों ने उसे शिव स्तुति करने की सलाह दी ताकि उसका हाथ उस पर्वत से मुक्‍त हो सके।

दशानन ने बिना देरी किए हुए सामवेद में उल्लेखित शिव के सभी स्तोत्रों का गान करना शुरू कर दिया, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने दशानन को क्षमा करते हुए उसकी बाँहों को मुक्त किया।

दशानन द्वारा भगवान शिव की स्‍तुति के लिए किए जो स्‍त्रोत गाया गया था, वह दशानन ने भयंकर दर्द व क्रोध के कारण भीषण चीत्‍कार से गाया था और इसी भीषण चीत्‍कार को संस्‍कृत भाषा में राव: सुशरूण: कहा जाता है। इसलिए जब भगवान शिव, रावण की स्‍तुति से प्रसन्‍न हुए और उसके हाथों को पर्वत के नीचे से मुक्‍त किया, तो उसी प्रसन्‍नता में उन्‍होंने दशानन का नाम रावण यानी ‘भीषण चीत्कार करने पर विवश शत्रु’ रखा क्‍योंकि भगवान शिव ने रावण को भीषण चीत्‍कार करने पर विवश कर दिया था और तभी से दशानन काे रावण कहा जाने लगा।

शिव की स्तुति के लिए रचा गया वह सामवेद का वह स्त्रोत, जिसे रावण ने गाया था, शिव तांडव स्‍त्रोत के नाम से जाना जाता है, जो कि निम्‍नानुसार है-

शिव तांडव स्‍त्रोत
जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥

सघन जटामंडल रूप वन से प्रवाहित होकर श्री गंगाजी की धाराएँ जिन शिवजी के पवित्र कंठ प्रदेश को प्रक्षालित (धोती) करती हैं, और जिनके गले में लंबे-लंबे बड़े-बड़े सर्पों की मालाएँ लटक रही हैं तथा जो शिवजी डमरू को डम-डम बजाकर प्रचंड तांडव नृत्य करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें।

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥

अति अम्भीर कटाहरूप जटाओं में अतिवेग से विलासपूर्वक भ्रमण करती हुई देवनदी गंगाजी की चंचल लहरें जिन शिवजी के शीश पर लहरा रही हैं तथा जिनके मस्तक में अग्नि की प्रचंड ज्वालाएँ धधक कर प्रज्वलित हो रही हैं, ऐसे बाल चंद्रमा से विभूषित मस्तक वाले शिवजी में मेरा अनुराग (प्रेम) प्रतिक्षण बढ़ता रहे।

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

पर्वतराजसुता के विलासमय रमणीय कटाक्षों से परम आनंदित चित्त वाले (माहेश्वर) तथा जिनकी कृपादृष्टि से भक्तों की बड़ी से बड़ी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं, ऐसे (दिशा ही हैं वस्त्र जिसके) दिगम्बर शिवजी की आराधना में मेरा चित्त कब आनंदित होगा।

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥

जटाओं में लिपटे सर्प के फण के मणियों के प्रकाशमान पीले प्रभा-समूह रूप केसर कांति से दिशा बंधुओं के मुखमंडल को चमकाने वाले, मतवाले, गजासुर के चर्मरूप उपरने से विभूषित, प्राणियों की रक्षा करने वाले शिवजी में मेरा मन विनोद को प्राप्त हो।

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥

इंद्रादि समस्त देवताओं के सिर से सुसज्जित पुष्पों की धूलिराशि से धूसरित पादपृष्ठ वाले सर्पराजों की मालाओं से विभूषित जटा वाले प्रभु हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें।

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥

इंद्रादि देवताओं का गर्व नाश करते हुए जिन शिवजी ने अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया, वे अमृत किरणों वाले चंद्रमा की कांति तथा गंगाजी से सुशोभित जटा वाले, तेज रूप नर मुंडधारी शिवजीहमको अक्षय सम्पत्ति दें।

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥

जलती हुई अपने मस्तक की भयंकर ज्वाला से प्रचंड कामदेव को भस्म करने वाले तथा पर्वत राजसुता के स्तन के अग्रभाग पर विविध भांति की चित्रकारी करने में अति चतुर त्रिलोचन में मेरी प्रीति अटल हो।

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥

नवीन मेघों की घटाओं से परिपूर्ण अमावस्याओं की रात्रि के घने अंधकार की तरह अति गूढ़ कंठ वाले, देव नदी गंगा को धारण करने वाले, जगचर्म से सुशोभित, बालचंद्र की कलाओं के बोझ से विनम, जगत के बोझ को धारण करने वाले शिवजी हमको सब प्रकार की सम्पत्ति दें।

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥

फूले हुए नीलकमल की फैली हुई सुंदर श्याम प्रभा से विभूषित कंठ की शोभा से उद्भासित कंधे वाले, कामदेव तथा त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दुखों के काटने वाले, दक्षयज्ञविध्वंसक, गजासुरहंता, अंधकारसुरनाशक और मृत्यु के नष्ट करने वाले श्री शिवजी का मैं भजन करता हूँ।

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥

कल्याणमय, नाश न होने वाली समस्त कलाओं की कलियों से बहते हुए रस की मधुरता का आस्वादन करने में भ्रमररूप, कामदेव को भस्म करने वाले, त्रिपुरासुर, विनाशक, संसार दुःखहारी, दक्षयज्ञविध्वंसक, गजासुर तथा अंधकासुर को मारनेवाले और यमराज के भी यमराज श्री शिवजी का मैं भजन करता हूँ।

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-
द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

अत्यंत शीघ्र वेगपूर्वक भ्रमण करते हुए सर्पों के फुफकार छोड़ने से क्रमशः ललाट में बढ़ी हुई प्रचंड अग्नि वाले मृदंग की धिम-धिम मंगलकारी उधा ध्वनि के क्रमारोह से चंड तांडव नृत्य में लीन होने वाले शिवजी सब भाँति से सुशोभित हो रहे हैं।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥

कड़े पत्थर और कोमल विचित्र शय्या में सर्प और मोतियों की मालाओं में मिट्टी के टुकड़ों और बहुमूल्य रत्नों में, शत्रु और मित्र में, तिनके और कमललोचननियों में, प्रजा और महाराजाधिकराजाओं के समान दृष्टि रखते हुए कब मैं शिवजी का भजन करूँगा।

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥13॥

कब मैं श्री गंगाजी के कछारकुंज में निवास करता हुआ, निष्कपटी होकर सिर पर अंजलि धारण किए हुए चंचल नेत्रों वाली ललनाओं में परम सुंदरी पार्वतीजी के मस्तक में अंकित शिव मंत्र उच्चारण करते हुए परम सुख को प्राप्त करूँगा।

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥

देवांगनाओं के सिर में गूँथे पुष्पों की मालाओं के झड़ते हुए सुगंधमय पराग से मनोहर, परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगों की सुंदरताएँ परमानंदयुक्त हमारेमन की प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहें।

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥

प्रचंड बड़वानल की भाँति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों तथा चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं से शिव विवाह समय में गान की गई मंगलध्वनि सब मंत्रों में परमश्रेष्ठ शिव मंत्र से पूरित, सांसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पाएँ।

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥

इस परम उत्तम शिवतांडव श्लोक को नित्य प्रति मुक्तकंठ सेपढ़ने से या श्रवण करने से संतति वगैरह से पूर्ण हरि और गुरु मेंभक्ति बनी रहती है। जिसकी दूसरी गति नहीं होती शिव की ही शरण में रहता है।

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

शिव पूजा के अंत में इस रावणकृत शिव तांडव स्तोत्र का प्रदोष समय में गान करने से या पढ़ने से लक्ष्मी स्थिर रहती है। रथ गज-घोड़े से सर्वदा युक्त रहता है।
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. 💐 #श्रीदुर्गा #माताष्टकम् 💐

भव-भय-भंजिनि-भक्ति-विलासिनि- सत्य-विकासिनि-मुक्तिकरे,
जय-रघुनाथ-समर्चित-पादसरोज-पराग-पयोधिपरे।
गिरिवर-कंदर-मध्य-निवासिनि-शोक-निवारिणि शूलधरे,
जयजय देविभवानि सुरेश्वरि भावविभूति-विभक्तिकरे !! १ !!
भगवति भद्र-विभासिनि लासिनि लोक-परायण-धैर्यधरे,
विनय-विलास-विकास-विभासिनि मोद-विनोद-विदानकरे।
धन-जन-यौवन-रूप-सुतादि-समस्त-सुखादिकरे विमले,
जयजय देविभवानि सुरेश्वरि भावविभूति-विभक्तिकरे !! २ !!
नवनव-पल्लव-पुष्प-फलादि-वितान-परायण-युक्तिमये,
श्रुति-गति-शोधक-बोधक-मोदक-नोदन-वृंद-विधानकरे।
विशरणदे करदे खरदे गरदे नरदे वरदे परदे,
जयजय देविभवानि सुरेश्वरि भावविभूति-विभक्तिकरे !! ३ !!
मुनिमन-वंदित पंडित-मंडित दुष्ट-विखंडित-कीर्तिधरे,
अरिकुल-संकुल-भीति-विदारिणि निर्भय-कारिणि लोककरे।
भव-मद-मोह-विकाम-विलोभ-विकोप-कलाप-विलोपकरे,
जयजय देविभवानि सुरेश्वरि भावविभूति-विभक्तिकरे!! ४ !!
त्रिभुवन-सागर-वीचि-समुल्लसि-तालय-लोक-निवासकरे,
जनमन-रंजिनि शोक-विभंजिनि सौख्य-विधायिनि मुक्तिकरे।
निज-जन-लालन-पालन-रक्षण-शिक्षण-वीक्षण-दक्षसुते,
जयजय देविभवानि सुरेश्वरि भावविभूति-विभक्तिकरे। !! ५ !!
हिमगिरि-केलि-कलाकुशले मृगराज-समाज-विभाव-जिते,
शशिधर-सेवन-तत्पर-माधव-राघव-पूजित-पादतले।
ऋषि-मुनि-वृंद-विनंदित-वंदित-सेवित-मानित-देहधरे,
जयजय देविभवानि सुरेश्वरि भावविभूति-विभक्तिकरे !! ६ !!
गुणगण-गर्वित-जीव-चराचर-चित्त समाहित-शक्तिधरे,
सुर-वनिता-गण-सेवित-भावित-दैत्य-विनाशिनि-दीनपरे।
सुर-सरिता-तटवर्ति-महालय-कांति-विकासिनि-वासकरे,
जयजय देविभवानि सुरेश्वरि भावविभूति-विभक्तिकरे !! ७ !!
गणपति-षड्मुख-भीषण-भैरव-सिंह-कपीश्वर-संगपरे,
दशमुख-रावण-वंश-विमर्दिनि-भूमिसुता-नवरूपधरे।
हर हर वं करुणा-वरुणालय-भावसमेधित-भावधरे,
जयजय देविभवानि सुरेश्वरि भावविभूति-विभक्तिकरे। !! ८ !!
लिखति-सुधारस-सिंचित-कुंचित-काव्यकला-रस-सिक्तमतिः,
तवसुत-भाव-भरोह-ममत्व-मसीति-विचार-विभूतिगतिः।
तव-शरणागत-वृंद-वशंगत-दीनशिरोमणि-पापरतिः,
कुरु करुणां मयि दीनसुतोपरि देहि सुदृष्टि-सुभावयुतिः !! ९ !!

. #त्र्यंबकेश्वरश्चैतन्य:
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