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विश्व मानव कल्याण ट्रस्ट

#सनातन_संस्कृति का #आनुवंशिक_विज्ञान

पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नही होता | आइए जाने क्यूँ ?

अब एक बात ध्यान दें की स्त्री में गुणसूत्र xx होते है और पुरुष में xy होते है ।
इनकी सन्तति में माना की पुत्र हुआ (xy गुणसूत्र). इस पुत्र में y गुणसूत्र पिता से ही आया यह तो निश्चित ही है क्यू की माता में तो y गुणसूत्र होता ही नही !
और यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र). यह गुण सूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों से आते है ।
१. xx गुणसूत्र ;-
xx गुणसूत्र अर्थात पुत्री . xx गुणसूत्र के जोड़े में एक x गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा x गुणसूत्र माता से आता है . तथा इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है जिसे Crossover कहा जाता है ।
२. xy गुणसूत्र ;-
xy गुणसूत्र अर्थात पुत्र . पुत्र में y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्यू की माता में y गुणसूत्र है ही नही । और दोनों गुणसूत्र असमान होने के कारन पूर्ण Crossover नही होता केवल ५ % तक ही होता है । और ९ ५ % y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही रहता है ।
तो महत्त्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ । क्यू की y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है की यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है ।
बस इसी y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है जो हजारों/लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था ।
वैदिक गोत्र प्रणाली और y गुणसूत्र । Y Chromosome and the Vedic Gotra System
अब तक हम यह समझ चुके है की वैदिक गोत्र प्रणाली य गुणसूत्र पर आधारित है अथवा y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है ।
उदहारण के लिए यदि किसी व्यक्ति का गोत्र कश्यप है तो उस व्यक्ति में विधमान y गुणसूत्र कश्यप ऋषि से आया है या कश्यप ऋषि उस y गुणसूत्र के मूल है ।
चूँकि y गुणसूत्र स्त्रियों में नही होता यही कारन है की विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है ।
वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारन यह है की एक ही गोत्र से होने के कारन वह पुरुष व् स्त्री भाई बहिन कहलाये क्यू की उनका पूर्वज एक ही है ।
परन्तु ये थोड़ी अजीब बात नही? की जिन स्त्री व् पुरुष ने एक दुसरे को कभी देखा तक नही और दोनों अलग अलग देशों में परन्तु एक ही गोत्र में जन्मे , तो वे भाई बहिन हो गये .?
इसका एक मुख्य कारन एक ही गोत्र होने के कारन गुणसूत्रों में समानता का भी है । आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी ।

ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता। ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था।
इस गोत्र का संवहन यानी उत्तराधिकार पुत्री को एक पिता प्रेषित न कर सके, इसलिये विवाह से पहले #कन्यादान कराया जाता है और गोत्र मुक्त कन्या का पाणिग्रहण कर भावी वर अपने कुल गोत्र में उस कन्या को स्थान देता है, यही कारण था कि विधवा विवाह भी स्वीकार्य नहीं था। क्योंकि, कुल गोत्र प्रदान करने वाला पति तो मृत्यु को प्राप्त कर चुका है।
इसीलिये, कुंडली मिलान के समय वैधव्य पर खास ध्यान दिया जाता और मांगलिक कन्या होने से ज्यादा सावधानी बरती जाती है।
आत्मज़् या आत्मजा का सन्धिविच्छेद तो कीजिये।
आत्म+ज या आत्म+जा ।
आत्म=मैं, ज या जा =जन्मा या जन्मी। यानी जो मैं ही जन्मा या जन्मी हूँ।
यदि पुत्र है तो 95% पिता और 5% माता का सम्मिलन है। यदि पुत्री है तो 50% पिता और 50% माता का सम्मिलन है। फिर यदि पुत्री की पुत्री हुई तो वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा, फिर यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% डीएनए रह जायेगा, इस तरह से सातवीं पीढ़ी मेंपुत्री जन्म में यह % घटकर 1% रह जायेगा।
अर्थात, एक पति-पत्नी का ही डीएनए सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है, और यही है सात जन्मों का साथ।
लेकिन, जब पुत्र होता है तो पुत्र का गुणसूत्र पिता के गुणसूत्रों का 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है और माता का 5% (जो कि किन्हीं परिस्थितियों में एक % से कम भी हो सकता है) डीएनए ग्रहण करता है, और यही क्रम अनवरत चलता रहता है, जिस कारण पति और पत्नी के गुणों युक्त डीएनए बारम्बार जन्म लेते रहते हैं, अर्थात यह जन्म जन्मांतर का साथ हो जाता है।
इसीलिये, अपने ही अंश को पित्तर जन्मों जन्म तक आशीर्वाद देते रहते हैं और हम भी अमूर्त रूप से उनके प्रति श्रधेय भाव रखते हुए आशीर्वाद आशीर्वाद ग्रहण करते रहते हैं, और यही सोच हमें जन्मों तक स्वार्थी होने से बचाती है, और सन्तानों की उन्नति के लिये समर्पित होने का सम्बल देती है।

एक बात और, माता पिता यदि कन्यादान करते हैं, तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे कन्या को कोई वस्तु समकक्ष समझते हैं, बल्कि इस दान का विधान इस निमित किया गया है कि दूसरे कुल की कुलवधू बनने के लिये और उस कुल की कुल धात्री बनने के लिये, उसे गोत्र मुक्त होना चाहिये। डीएनए मुक्त हो नहीं सकती क्योंकि भौतिक शरीर में वे डीएनए रहेंगे ही, इसलिये मायका अर्थात माता का रिश्ता बना रहता है, गोत्र यानी पिता के गोत्र का त्याग किया जाता है। तभी वह भावी वर को यह वचन दे पाती है कि उसके कुल की मर्यादा का पालन करेगी यानी उसके गोत्र और डीएनए को करप्ट नहीं करेगी, वर्णसंकर नहीं करेगी, क्योंकि कन्या विवाह के बाद कुल वंश के लिये #रज् का रजदान करती है और मातृत्व को प्राप्त करती है। यही कारण है कि हर विवाहित स्त्री माता समान पूज्यनीय हो जाती है।
यह रजदान भी कन्यादान की तरह उत्तम दान है जो पति को किया जाता है।
यह शुचिता अन्य किसी सभ्यता में दृश्य ही नहीं है...
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. 🔔 #देवउठनी #एकादशी 🔔

. 31--10--2017 को मंगलवार को मनाया जाएगा ।

#कार्तिक माह की #शुक्लपक्ष की #एकादशी को #देवउठनी #एकादशी कहा जाता है। इसे #देवोत्थान #एकादशी, देवउठनी ग्यारस, #प्रबोधिनी #एकादशी आदि नामों से भी जाना जाता है।
एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे। प्रजा तथा नौकर-चाकरों से लेकर पशुओं तक को एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाता था।
एक दिन किसी दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा के पास आकर बोला- महाराज! कृपा करके मुझे नौकरी पर रख लें। तब राजा ने उसके सामने एक शर्त रखी कि ठीक है, रख लेते हैं। किन्तु रोज तो तुम्हें खाने को सब कुछ मिलेगा, पर एकादशी को अन्न नहीं मिलेगा।

उस व्यक्ति ने उस समय 'हाँ' कर ली, पर एकादशी के दिन जब उसे फलाहार का सामान दिया गया तो वह राजा के सामने जाकर गिड़गिड़ाने लगा- महाराज! इससे मेरा पेट नहीं भरेगा। मैं भूखा ही मर जाऊँगा। मुझे अन्न दे दो।
राजा ने उसे शर्त की बात याद दिलाई, पर वह अन्न छोड़ने को राजी नहीं हुआ, तब राजा ने उसे आटा-दाल-चावल आदि दिए। वह नित्य की तरह नदी पर पहुँचा और स्नान कर भोजन पकाने लगा। जब भोजन बन गया तो वह भगवान को बुलाने लगा- आओ भगवान! भोजन तैयार है।
बुलाने पर पीताम्बर धारण किए भगवान चतुर्भुज रूप में आ पहुँचे तथा प्रेम से उसके साथ भोजन करने लगे। भोजनादि करके भगवान अंतर्धान हो गए तथा वह अपने काम पर चला गया।

पंद्रह दिन बाद अगली एकादशी को वह राजा से कहने लगा कि महाराज, मुझे दुगुना सामान दीजिए। उस दिन तो मैं भूखा ही रह गया। राजा ने कारण पूछा तो उसने बताया कि हमारे साथ भगवान भी खाते हैं। इसीलिए हम दोनों के लिए ये सामान पूरा नहीं होता।

यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोला- मैं नहीं मान सकता कि भगवान तुम्हारे साथ खाते हैं। मैं तो इतना व्रत रखता हूँ, पूजा करता हूँ, पर भगवान ने मुझे कभी दर्शन नहीं दिए।

राजा की बात सुनकर वह बोला- महाराज! यदि विश्वास न हो तो साथ चलकर देख लें। राजा एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गया। उस व्यक्ति ने भोजन बनाया तथा भगवान को शाम तक पुकारता रहा, परंतु भगवान न आए। अंत में उसने कहा- हे भगवान! यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूँगा।

लेकिन भगवान नहीं आए, तब वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से नदी की तरफ बढ़ा। प्राण त्यागने का उसका दृढ़ इरादा जान शीघ्र ही भगवान ने प्रकट होकर उसे रोक लिया और साथ बैठकर भोजन करने लगे। खा-पीकर वे उसे अपने विमान में बिठाकर अपने धाम ले गए।

यह देख राजा ने सोचा कि व्रत-उपवास से तब तक कोई फायदा नहीं होता, जब तक मन शुद्ध न हो। इससे राजा को ज्ञान मिला। वह भी मन से व्रत-उपवास करने लगा और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुआ।

इति शुभम्।
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💐 #छठ #ब्रत #पौराणिक #कथा 💐

हमारे देश में सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ। मुख्य रूप से इसे सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। चैत्र मास एवं कार्तिक मास ।

💐#छठ के #महापर्व पर #सुने #यह #प्रमुख #कथाएं ! 💐

हमारे हिन्दू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण पर्व हैं " महापर्व छठ" ।

वैसे तो हमारे धर्म में हर त्यौहार का अपना -अपना अलग ही महत्व होता हैं । हर पर्व की अपनी पूजा -पाठ करने का तरीका भी अलग होता हैं । छठ माता की पूजा -अर्चना पुरे उत्तर -भारत में बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । इस ख़ास पूजा में भगवान सूर्य की पूजा अर्चना का प्रावधान हैं । अस्ताचल सूर्य को अर्ध देकर इस ख़ास व्रत की शुरुआत की जाती हैं ।
सूर्य भगवान के उपासना का सबसे बड़ा त्योहार छठ आता है। इस साल चार दिनों तक चलने वाला ये छठ पर्व 24 अक्टूबर से नहाय खाय के साथ शुरू होगा। 25 अक्टूबर को खरना, 26 अक्टूबर को सांझ का अर्ध्य और 27 अक्टूबर को सूर्य को सुबह का अर्ध्य के साथ ये त्योहार संपन्न होगा।

हमारे धर्म की मान्यता के अनुसार माता छठ की कई कथाएं प्रचलित हैं । जिनका अनुशरण व्रत करने वाली महिला या पुरुष को जरूर करना चाहिए । व्रत की कथाएं अपने में एक अलग ही हमारी धार्मिक प्रथा को उजागर करती है, व्रत को धारण करने वाले को पूजा - अर्चना के साथ व्रत कथा का भी पाठ करना चाहिए ।

कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को छठ पूजा पुरे विधि -विधान से मनाई जाती हैं । यह महापर्व चार दिन का होता हैं । जोकि चौथ से सप्तमी तक होती हैं पूरी हर्षोउल्लास के साथ माता छठ की आराधना होती हैं । इन्हें कार्तिक छठ के नाम से भी जाना जाता हैं । चैत के महीने में भी यह पर्व मनाया जाता हैं । जिसको चैती छठ के नाम से जानते हैं । पष्ठी के ख़ास दिन माता छठ की पूजा -अर्चना की जाती हैं । हमारे धार्मिक आस्था के अनुसार उषआ यानि की छठ मईया कहा जाता हैं । शास्त्रों के अनुसार भगवान सूर्य और माता छठ यह दोनों संबंधी यानि सूर्य की बहन हैं । क्योंकि इस पूजा में भगवान सूर्य की भी पूजा -आराधना की जाती हैं। जो भी व्यक्ति छठ माता के साथ भगवान् सूर्य की पूजा करता हैं । तो इससे माता छठी खुश होती हैं वह उस व्यक्ति के संतान की हमेशा सुरक्षा करती हैं ।

#छठीमईया की #प्रमुख #कथाएं

. ( १ )
भगवान सूर्य की उपासना से हुई राजा प्रियवंद दंपति को संतान प्राप्ति इनके बारे में कहा जाता हैं कि बहुत समय पहले की बात है राजा प्रियवंद और रानी मालिनी की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप के निर्देश पर इस दंपति ने यज्ञ किया जिसके चलते उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। दुर्भाग्य से यह उनका बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ। इस घटना से विचलित राजा-रानी प्राण छोड़ने के लिए आतुर होने लगे। उसी समय भगवान की भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने बताया कि उनकी पूजा करने से संतान सुख की प्राप्ति होगी। राजा प्रियंवद और रानी मालती ने देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। और तभी से छठ पूजा होती है।

. ( २ )
दूसरी कथा अयोध्या लौटने पर भगवान राम ने किया था राजसूर्य यज्ञ विजयादशमी के दिन लंकापति रावण के वध के बाद दिवाली के दिन भगवान राम अयोध्या पहुंचे। रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान राम ने ऋषि-मुनियों की सलाह से राजसूर्य यज्ञ किया। इस यज्ञ के लिए अयोध्या में मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया। मुग्दल ऋषि ने माता सीता को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। इसके बाद माता सीता ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।
. ( ३ )
तीसरी व्रत कथा जब कर्ण को मिला भगवान सूर्य से वरदान

हमारे शास्त्रों में बताया गया हैं कि छठ या सूर्य पूजा महाभारत काल से की जाती है। कहते हैं कि छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। मान्याताओं के अनुसार वे प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य को अर्घ्‍य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे।
. ( ४ )
चौथी छठ मईया की कथा राजपाठ वापसी के लिए द्रौपदी ने की थी छठ पूजा ।
महाभारत में छठ की महिमा के दो बड़े उदाहरण मौजूद हैं। महाभारत काल में छठ पूजा का एक और वर्णन मिलता है। जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाठ तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था। इसी लिए इस पर्व को महापर्व कहा जाता हैं । छठ मईया की महिमा आज से नहीं प्राचीन काल से हैं । माता छठ की पूजा अर्चना बड़ी ही भक्ति साथ करने से मन की सारी बाधाए दूर होती हैं ।
. पँ०हिमांशु मिश्र,
. 7739792520,
.www.ambikabhawani.in
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💐 #महिषासुरमर्दिनि #स्तोत्रम् : 💐


अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण् कुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० !!
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. 💐 #श्रीसूक्त #का #दीपावली #में #प्रयोग 💐

१॰ “श्रीं ह्रीं क्लीं।।हिरण्य-वर्णा हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।। श्रीं ह्रीं क्लीं”
सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, ‘श्रीसूक्त’ की उक्त ‘हिरण्य-वर्णा॰॰’ ऋचा में ‘श्रीं ह्रीं क्लीं’ बीज जोड़कर प्रातः, दोपहर और सांय एक-एक हजार (१० माला) जप करे। इस प्रकार सवा लाख जप होने पर मधु और कमल-पुष्प से दशांश हवन करे और तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण-भोजन नियम से करे।
इस प्रयोग का पुरश्चरण ३२ लाख जप का है। सवा लाख का जप, होम आदि हो जाने पर दूसरे सवा लाख का जप प्रारम्भ करे। ऐसे कुल २६ प्रयोग करने पर ३२ लाख का प्रयोग सम्पूर्ण होता है।
इस प्रयोग का फल राज-वैभव, सुवर्ण, रत्न, वैभव, वाहन, स्त्री, सन्तान और सब प्रकार का सांसारिक सुख की प्राप्ति है।
२॰ “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।।
दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
ॐ ऐं हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।।”
यह ‘श्रीसूक्त का एक मन्त्र सम्पुटित हुआ। इस प्रकार ‘तां म आवह’ से लेकर ‘यः शुचिः’ तक के १६ मन्त्रों को सम्पुटित कर पाठ करने से १ पाठ हुआ। ऐसे १२ हजार पाठ करे। चम्पा के फूल, शहद, घृत, गुड़ का दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मा[2
: ॰ “ॐ ऐं ॐ ह्रीं।। तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरुषानहम्।। ॐ ऐं ॐ ह्रीं”
सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, नित्य सांय-काल एक हजार (१० माला) जप करे। कुल ३२ दिन का प्रयोग है। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे।
माँ लक्ष्मी स्वप्न में आकर धन के स्थान या धन-प्राप्ति के जो साधन अपने चित्त में होंगे, उनकी सफलता का मार्ग बताएँगी। धन-समृद्धि स्थिर रहेगी। प्रत्येक तीन वर्ष के अन्तराल में यह प्रयोग करे।

४॰ “ॐ ह्रीं ॐ श्रीं।। अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।। ॐ ह्रीं ॐ श्रीं”
उक्त मन्त्र का प्रातः, मध्याह्न और सांय प्रत्येक काल १०-१० माला जप करे। संकल्प, न्यास, ध्यान कर जप प्रारम्भ करे। इस प्रकार ४ वर्ष करने से मन्त्र सिद्ध होता है। प्रयोग का पुरश्चरण ३६ लाख मन्त्र-जप का है। स्वयं न कर सके, तो विद्वान ब्राह्मणों द्वारा कराया जा सकता है।
खोया हुआ या शत्रुओं द्वारा छिना हुआ धन प्राप्त होता है।

५॰ “करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।
अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।
करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।।”
उक्त आधे मन्त्र का सम्पुट कर १२ हजार जप करे। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे।
इससे धन, ऐश्वर्य, यश बढ़ता है। शत्रु वश में होते हैं। खोई हुई लक्ष्मी, सम्पत्ति पुनः प्राप्त होती है।

: ६॰ “ॐ श्रीं ॐ क्लीं।। कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।। ॐ श्रीं ॐ क्लीं”
उक्त मन्त्र का पुरश्चरण आठ लाख जप का है। जप पूर्ण होने पर पलाश, ढाक की समिधा, दूध और गाय के घी से हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोज करे।
इस प्रयोग से सभी प्रकार की समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है।

७॰ “सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।”
उक्त सम्पुट मन्त्र का १२ लाख जप करे। ब्राह्मण द्वारा भी कराया जा सकता है।
इससे गत वैभव पुनः प्राप्त होता है और धन-धान्य-समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है।

८॰ “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।।
दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।।”
उक्त प्रकार से सम्पुटित मन्त्र का १२ हजार जप करे।
इस प्रयोग से वैभव, लक्ष्मी, सम्पत्ति, वाहन, घर, स्त्री, सन्तान का लाभ मिलता है।

९॰ “ॐ क्लीं ॐ वद-वद।। चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।। ॐ क्लीं ॐ
वद-वद।।”

उक्त मन्त्र का संकल्प, न्यास, ध्यान कर एक लाख पैंतीस हजार जप करना चाहिए। गाय के गोबर से लिपे हुए स्थान पर बैठकर नित्य १००० जप करना चाहिए। यदि शीघ्र सिद्धि प्राप्त करना हो, तो तीनों काल एक-एक हजार जप करे या ब्राह्मणों से करावे। ४५ हजार पूर्ण होने पर दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे। ध्यान इस प्रकार है-
“अक्षीण-भासां चन्द्राखयां, ज्वलन्तीं यशसा श्रियम्।
देव-जुष्टामुदारां च, पद्मिनीमीं भजाम्यहम्।।”
इस प्रयोग से मनुष्य धनवान होता है।

१०॰ “ॐ वद वद वाग्वादिनि।। आदित्य-वर्णे! तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।। ॐ वद वद वाग्वादिनि”
देवी की स्वर्ण की प्रतिमा बनवाए। चन्दन, पुष्प, बिल्व-पत्र, हल्दी, कुमकुम से उसका पूजन कर एक से तीन हजार तक उक्त मन्त्र का जप करे। कुल ग्यारह लाख का प्रयोग है। जप पूर्ण होने पर बिल्व-पत्र, घी, खीर से दशांश होम, तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोजन करे। यह प्रयोग ब्राह्मणों द्वारा भी कराया जा सकता है। ‘ऐं क्लीं सौः ऐं श्रीं’– इन बीजों से कर-न्यास और हृदयादि-न्यास करे। ध्यान इस प्रकार करे- “उदयादित्य-संकाशां, बिल्व-कानन-मध्यगाम्। तनु-मध्यां श्रियं ध्यायेदलक्ष्मी-परिहारिणीम्।।”
प्रयोग-काल में फल और दूध का आहार करे। पकाया हुआ पदार्थ न खाए। पके हुए बिल्व-फल फलाहार में काए जा सकते हैं। यदि सम्भव हो तो बिल्व-वृक्ष के नीचे बैठकर जप करे। इस प्रयोग से वाक्-सिद्धि मिलती है और लक्ष्मी स्थिर रहती है।

११॰ “ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय, महा-माया प्रयच्छति।।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजाते, वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु, मायान्तरा ताश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।
ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय………

उक्त मन्त्र का १२००० जप कर दशांश होम, तर्पण करे। इस प्रयोग से जिस वस्तु की या जिस मनुष्य की इच्छा हो, उसका आकर्षण होता है और वह अपने वश में रहता है। राजा या राज्य-कर्ताओं को वश करने के लिए ४८००० जप करना चाहिए।

१२॰ “ॐ वाग्वादिनी ॐ ऐं। उपैतु मां देवसखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्ति वृद्धिं ददातु मे। ॐ वाग्वादिनी ॐ ऐं।।”
उक्त मन्त्र का बत्तीस लाख बीस हजार जप करे। “ॐ अस्य श्रीसूक्तस्य ‘उपैतु मां॰’ मन्त्रस्य कुबेर ऋषिः, मणि-मालिनी लक्ष्मीः देवता, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीं ब्लूं क्लीं बीजानि ममाभीष्ट-कामना-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।’ इस प्रकार ‘विनियोग’, ऋष्यादि-न्यास’ कर ‘आं ह्रीं क्रों ऐं श्रीं आं ह्रं क्रौं ऐं’ इन ९ बीजों से कर-न्यास एवं ‘हृदयादि-न्यास’ करे। ध्यान- “राज-राजेश्वरीं लक्ष्मीं, वरदां मणि-मालिनीं। देवीं देव-प्रियां कीर्ति, वन्दे काम्यार्थ-सिद्धये।।”
मणि-मालिनी लक्ष्मी देवी की स्वर्ण की मूर्ति बनाकर, बिल्व-पत्र, दूर्वा, हल्दी, अक्षत, मोती, केवड़ा, चन्दन, पुष्प आदि से पूजन करे। ‘श्री-ललिता-सहस्त्रनाम-स्तोत्र’ के प्रत्येक नाम के साथ ‘श्रीं’ बीज लगाकर पूजन करे। सन्ध्यादि नित्य कर्म कर प्रयोग का प्रारम्भ करे। घी का दीप और गूगल का धूप करे। द्राक्षा, खजूर, केले, ईख, शहद, घी, दाड़िम, केरी, नारियल आदि जो प्राप्त हो, नैवेद्य में दे। प्रातः और मध्याह्न में १००० और रात्रि में २००० नित्य जप करे। ढाई साल में एक व्यक्ति बत्तीस लाख बीस हजार का जप पूर्ण कर सकता है। जप करने के लिए प्रवाल की माला ले। जप पूर्ण होने पर अपामार्ग की समिधा, धृत, खीर से दशांश होम कर मार्जन और ब्रह्म-भोज करे।
इस प्रयोग से कुबेर आदि देव साक्षात् या स्वप्न में दर्शन देते हैं और धन, सुवर्ण, रत्न, रसायन, औषधि, दिव्याञ्जन आदि देते हैं।

: १३॰ “ॐ ऐं ॐ सौः। क्षुत्-पिपासामला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्। ॐ ऐं ॐ सौः”
उक्त मन्त्र का ३२,००० जप करे। प्रतिदिन रात्रि में वीरासन में बैठकर ३००० जप करे। ‘अग्नि-होत्र-कुण्ड’ के सम्मुख बैठकर ‘जप’ करने से विशेष फल मिलता है। रुद्राक्ष की माला से जप करे। तिल, गुड़ और घी से दशांश होम तथा तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोजन करावे। ध्यान- “खड्गं स-वात-चक्रं च, कमलं वरमेव च। करैश्चतुर्भिर्विभ्राणां, ध्याये चंद्राननां श्रियम्।।”
एक अनुष्ठान दस दिन में पूर्ण होगा। इस प्रकार चार अनुष्ठान पूरे करें।
इस प्रयोग से शत्रु का या बिना कारण हानि पहुँचानेवाले का नाश होगा और दरिद्रता, निर्धनता, रोग, भय आदि नष्ट होकर प्रयोग करने वाला अपने कुटुम्ब के साथ दीर्घायुषी और ऐश्वर्यवान् होता है। ग्रह-दोषों का अनिष्ट फल, कारण और क्षुद्र तत्वों की पीड़ा आदि नष्ट होकर भाग्योदय होता है।

१४॰ “रोगानशेषानपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम्, त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।
क्षुत्-पिपासामला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहं। अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम्, त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।”
उक्त मन्त्र का १००० जप रात्रि में करे। २०००० जप होने पर दशांश होम-काले तिल, सुपाड़ी, राई से करे। दशांश तर्पण, मार्जन आदि करे। शत्रु के विनाश के लिए, रोगों की शान्ति के लिए और विपत्तियों के निवारण के लिए यह उत्तम प्रयोग है। शत्रु-नाश के लिए रीठे के बीज की माला से काले ऊन के आसन पर वीरासन-मुद्रा से बैठकर क्रोध-मुद्रा में जप करे।

१५॰ “ॐ सौः ॐ हंसः। गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्। ॐ सौः ॐ हंसः।।”
उक्त मन्त्र का एक लाख साठ हजार जप करे। कमल-गट्टे की माला से कमल के आसन पर या कौशेय वस्त्र के आसन पर बैठकर जप करे। ‘स्थण्डिल’ पर केसर, कस्तुरी, चन्दन, कपूर आदि सुगन्धित द्रव्य रखकर श्रीलक्ष्मी देवी की मूर्ति की पूजा करे। जप पूर्ण होने पर खीर, कमल-पुष्प और तील से दशांश होम कर तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से धन-धान्य, समृद्धि, सोना-चाँदी, रत्न आदि मिलते हैं और सम्पन्न महानुभावों से बड़ा मान मिलता है।

१६॰ “ॐ हंसः ॐ आं। मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रुपममन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः। ॐ हंसः ॐ आं।।”
उक्त मन्त्र ८ लाख जपे। ‘ऐं-लं-वं-श्रीं’- को मन्त्र के साथ जोड़कर न्यास करे। यथा-
कर-न्यासः- ऐं-लं-वं-श्रीं मनसः अंगुष्ठाभ्यां नमः। ऐं-लं-वं-श्रीं काममाकूतिं तर्जनीभ्यां स्वाहा। ऐं-लं-वं-श्रीं वाचः सत्यमशीमहि मध्यमाभ्यां वषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं पशूनां अनामिकाभ्यां हुं। ऐं-लं-वं-श्रीं रुपममन्नस्य मयि कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं श्रीः श्रयतां यशः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्।
अंग-न्यासः- ऐं-लं-वं-श्रीं मनसः हृदयाय नमः। ऐं-लं-वं-श्रीं काममाकूतिं शिरसे स्वाहा। ऐं-लं-वं-श्रीं वाचः सत्यमशीमहि शिखायै वषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं पशूनां कवचाय हुं। ऐं-लं-वं-श्रीं रुपममन्नस्य मयि नेत्र-त्रयाय वौषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं श्रीः श्रयतां यशः अस्त्राय फट्।
ध्यानः- तां ध्यायेत् सत्य-संकल्पां, लक्ष्मीं क्षीरोदन-प्रियाम्।
ख्यातां सर्वेषु भूतेषु, तत्तद् ज्ञान-बल-प्रदाम्।।
उक्त धऽयतान करे। बिल्व फल, बिल्व-काष्ठ, पलाश की समिधा, घृत, तिल, शक्कर आदि से दशांश हवन कर तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से इच्छित वस्तु प्राप्त होती है और धन-धान्य, समृद्धि, व
लास बढ़ते हैं।

१७॰ “ॐ आं ॐ ह्रीं। कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।। ॐ आं ॐ ह्रीं।”
उक्त मन्त्र का ३२ लाख जप करे। मन्त्र के साथ ‘वं श्रीं’ बीज जोड़कर न्यास करे।
“स-वत्सा गौरिव प्रीता, कर्दमेन यथेन्दिरा। कल्याणी मद्-गृहे नित्यं, निवसेत् पद्म-मालिनी।।”
उक्त ध्यान करे। जीवित बछड़ेवाली गाय का और पुत्रवती, सौभाग्यवती स्त्रियों का पूजन करे। गो-शाला में बैठकर कमल-गट्टे की माला से जप करे। प्रतिदिन छोटे बच्चों को दूध पिलाए। जप पूर्ण होने पर दशांश होम, मार्जन, ब्रह्म-भोजन आदि करे।
इस प्रयोग से वन्ध्या स्त्री को भाग्य-शाली पुत्र होता है। वंश-वृद्धि होती है। होम शिव-लिंगी के बीज, खीर, श्वेत तिल, दूर्वा, घी से करे। तर्पण व मार्जन दूध से करे।

१८॰ “ॐ क्रौं ॐ क्लीं। आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलाङ पद्म-मालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवहम्।। ॐ क्रौं ॐ क्लीं”
उक्त मन्त्र प्रतिदिन ३००० जप करे। शुक्ल-पक्ष की पञ्चमी से प्रारम्भ कर पूर्णिमा तक जप करे। फिर दूसरे मास में शुक्ल पञ्चमी से पूर्णिमा तक जप करे। सम्भव हो, तो चन्द्र-मण्डल के सामने दृष्टि स्थिर रखकर जप करे। अथवा चन्द्रमा का प्रकाश अपने शरीर पर पड़ सके इस प्रकार बैठकर जप करे। रुद्राक्ष, कमल-गट्टे की माला से कौशेय वस्त्र या कमल-पुष्प-गर्भित आसन पर बैठकर जप करे। प्रयोग सोलह मास का है। ध्यान इस प्रकार करे-
“तां स्मरेदभिषेकार्द्रां, पुष्टिदां पुष्टि-रुपिणिम्। मैत्यादि-वृत्तिवभिश्चार्द्रां, विराजत्-करुणा श्रियम्।।
दयार्द्रां वेत्र-हस्तां च, व्रत-दण्ड-स्वरुपिणिम्। पिंगलाभां प्रसन्नास्यां पद्म-माला-धरां तथा।।
चन्द्रास्यां चन्द्र-रुपां च, चन्द्रां चन्द्रधरां तथा। हिरन्मयीं महा-लक्ष्मीमृचभेतां जपेन्निशि।।

: मन्त्र के अक्षर से विनियोग, ऋष्यादि-न्यास कर चन्द्र-मण्डल में भगवती का उक्त ध्यान कर सोलह मास का प्रयोग करना हो, तो शुक्ल पञ्चमी से प्रारम्भ करे। होम खीर, समिधा, कमल पुष्प, सफेद तिल, घृत, शहद आदि से करे। दशांश तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से वचन-सिद्धि, प्रतिष्ठा, वैभव की प्राप्ति होती है।

१९॰ “ॐ क्लीं ॐ। श्रीं आर्द्रां यः करिणीं यष्टि-सुवर्णां हेम-मालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो न आवह।। ॐ क्लीं ॐ”
उक्त मन्त्र के अनुष्ठान में तीन लाख साठ हजार जप करना होता है। तालाब के किनारे अथवा कमल पुष्पों के आसन पर बैठकर, कमल-गट्टे या स्वर्ण की माला में प्रति-दिन तीन हजार जप है। १२० दिन में प्रयोग पूर्ण होगा। खीर, कमल-पुष्प या घी आदि से दशांश होम करे। १०० सुवासिनी स्त्रियों को भोजन कराए और वस्त्र-भूषण, दक्षिणा दे। ध्यान निम्न प्रकार करे-
तां स्मरेदभिषेकार्द्रां, पुष्टिदां पुष्टि-रुपिणीं। रुक्माभां स्वप्न-धी-गम्यां, सुवर्णां स्वर्ण-मालिनी।।
सूर्यामैश्वर्य-रुपां च, सावित्रीं सूर्य-रुपिणीम्। आत्म-संज्ञां च चिद्रुपां, ज्ञान-दृष्टि-स्वरुपिणीं।
चक्षुः-प्राशदां चैव, हिरण्य-प्रचुरां तथा। स्वर्णात्मनाऽऽविर्भूतां च, जातवेदो म आवह।।
इस प्रयोग से ग्रहों की पीड़ा, ग्रह-बाधा-निवृत्ति होकर भाग्य का उदय होता है। अपना और अपने कुटुम्बियों के शरीर नीरोगी, दीर्घायुषी और प्रभावशाली होते हैं। जिससे मिलने की इच्छा हो, वह मनुष्य आ मिलता है।

२०॰ “ॐ श्रीं ॐ हूं। तां म आवह जातवेदो, लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो, दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहं।। ॐ श्रीं ॐ हूं”

‘ॐ अस्य श्री-पञ्च-दश-मन्त्र ऋचः कुबेरो ऋषिः, भूत-धात्री लक्ष्मी देवता, प्रस्तार-पंक्तिश्छन्दः, ह्रीं श्रीं ह्रीं इति बीजानि, ममाभीष्ट-फल-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः।’ इस प्रकार विनियोग कर ऋष्यादि-न्यास करे। ‘ह्रीं श्रीं ह्रीं’ यर बीज लगाकर अंग-न्यास तथा हृदयादि-न्यास करे। ध्यान इस प्रकार करें-
ध्याये लक्ष्मीं प्रहसित-मुखीं राज-सिंहासनस्थां। मुद्रा-शक्ति-सकल-विनुतां सर्व-संसेव्यनाम्।
अग्नौ पूज्यामखिल-जननीं हेम-वर्णां हिरण्यां। भाग्योपेतां भुवन-सुखदां भार्गवीं भुत-धात्रीम्।।
ज्वारी अथवा गेहूँ की राशि के ऊपर रतेशमी आसन बिछाकर, कमल-बीज की माला से नित्य तीन हजार जप करे। कुल सवा लाख जप करे। जप पूर्ण होने पर दूर्वा, खीर, मधु, घृत आदि से दशांश होम, तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से लक्ष्मी स्थिर रहती हैसूक्त के प्रयोग

१॰ “श्रीं ह्रीं क्लीं।।हिरण्य-वर्णा हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।। श्रीं ह्रीं क्लीं”
सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, ‘श्रीसूक्त’ की उक्त ‘हिरण्य-वर्णा॰॰’ ऋचा में ‘श्रीं ह्रीं क्लीं’ बीज जोड़कर प्रातः, दोपहर और सांय एक-एक हजार (१० माला) जप करे। इस प्रकार सवा लाख जप होने पर मधु और कमल-पुष्प से दशांश हवन करे और तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण-भोजन नियम से करे।
इस प्रयोग का पुरश्चरण ३२ लाख जप का है। सवा लाख का जप, होम आदि हो जाने पर दूसरे सवा लाख का जप प्रारम्भ करे। ऐसे कुल २६ प्रयोग करने पर ३२ लाख का प्रयोग सम्पूर्ण होता है।
इस प्रयोग का फल राज-वैभव, सुवर्ण, रत्न, वैभव, वाहन, स्त्री, सन्तान और सब प्रकार का सांसारिक सुख की प्राप्ति है।
२॰ “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।।
दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
ॐ ऐं हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।।”
यह ‘श्रीसूक्त का एक मन्त्र सम्पुटित हुआ। इस प्रकार ‘तां म आवह’ से लेकर ‘यः शुचिः’ तक के १६ मन्त्रों को सम्पुटित कर पाठ करने से १ पाठ हुआ। ऐसे १२ हजार पाठ करे। चम्पा के फूल, शहद, घृत, गुड़ का दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मा[2
: ॰ “ॐ ऐं ॐ ह्रीं।। तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरुषानहम्।। ॐ ऐं ॐ ह्रीं”
सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, नित्य सांय-काल एक हजार (१० माला) जप करे। कुल ३२ दिन का प्रयोग है। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे।
माँ लक्ष्मी स्वप्न में आकर धन के स्थान या धन-प्राप्ति के जो साधन अपने चित्त में होंगे, उनकी सफलता का मार्ग बताएँगी। धन-समृद्धि स्थिर रहेगी। प्रत्येक तीन वर्ष के अन्तराल में यह प्रयोग करे।

४॰ “ॐ ह्रीं ॐ श्रीं।। अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।। ॐ ह्रीं ॐ श्रीं”
उक्त मन्त्र का प्रातः, मध्याह्न और सांय प्रत्येक काल १०-१० माला जप करे। संकल्प, न्यास, ध्यान कर जप प्रारम्भ करे। इस प्रकार ४ वर्ष करने से मन्त्र सिद्ध होता है। प्रयोग का पुरश्चरण ३६ लाख मन्त्र-जप का है। स्वयं न कर सके, तो विद्वान ब्राह्मणों द्वारा कराया जा सकता है।
खोया हुआ या शत्रुओं द्वारा छिना हुआ धन प्राप्त होता है।

५॰ “करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।
अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।
करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।।”
उक्त आधे मन्त्र का सम्पुट कर १२ हजार जप करे। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे।
इससे धन, ऐश्वर्य, यश बढ़ता है। शत्रु वश में होते हैं। खोई हुई लक्ष्मी, सम्पत्ति पुनः प्राप्त होती है।

: ६॰ “ॐ श्रीं ॐ क्लीं।। कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।। ॐ श्रीं ॐ क्लीं”
उक्त मन्त्र का पुरश्चरण आठ लाख जप का है। जप पूर्ण होने पर पलाश, ढाक की समिधा, दूध और गाय के घी से हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोज करे।
इस प्रयोग से सभी प्रकार की समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है।

७॰ “सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।”
उक्त सम्पुट मन्त्र का १२ लाख जप करे। ब्राह्मण द्वारा भी कराया जा सकता है।
इससे गत वैभव पुनः प्राप्त होता है और धन-धान्य-समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है।

८॰ “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।।
दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।।”
उक्त प्रकार से सम्पुटित मन्त्र का १२ हजार जप करे।
इस प्रयोग से वैभव, लक्ष्मी, सम्पत्ति, वाहन, घर, स्त्री, सन्तान का लाभ मिलता है।

९॰ “ॐ क्लीं ॐ वद-वद।। चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।। ॐ क्लीं ॐ
वद-वद।।”

उक्त मन्त्र का संकल्प, न्यास, ध्यान कर एक लाख पैंतीस हजार जप करना चाहिए। गाय के गोबर से लिपे हुए स्थान पर बैठकर नित्य १००० जप करना चाहिए। यदि शीघ्र सिद्धि प्राप्त करना हो, तो तीनों काल एक-एक हजार जप करे या ब्राह्मणों से करावे। ४५ हजार पूर्ण होने पर दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे। ध्यान इस प्रकार है-
“अक्षीण-भासां चन्द्राखयां, ज्वलन्तीं यशसा श्रियम्।
देव-जुष्टामुदारां च, पद्मिनीमीं भजाम्यहम्।।”
इस प्रयोग से मनुष्य धनवान होता है।

१०॰ “ॐ वद वद वाग्वादिनि।। आदित्य-वर्णे! तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।। ॐ वद वद वाग्वादिनि”
देवी की स्वर्ण की प्रतिमा बनवाए। चन्दन, पुष्प, बिल्व-पत्र, हल्दी, कुमकुम से उसका पूजन कर एक से तीन हजार तक उक्त मन्त्र का जप करे। कुल ग्यारह लाख का प्रयोग है। जप पूर्ण होने पर बिल्व-पत्र, घी, खीर से दशांश होम, तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोजन करे। यह प्रयोग ब्राह्मणों द्वारा भी कराया जा सकता है। ‘ऐं क्लीं सौः ऐं श्रीं’– इन बीजों से कर-न्यास और हृदयादि-न्यास करे। ध्यान इस प्रकार करे- “उदयादित्य-संकाशां, बिल्व-कानन-मध्यगाम्। तनु-मध्यां श्रियं ध्यायेदलक्ष्मी-परिहारिणीम्।।”
प्रयोग-काल में फल और दूध का आहार करे। पकाया हुआ पदार्थ न खाए। पके हुए बिल्व-फल फलाहार में काए जा सकते हैं। यदि सम्भव हो तो बिल्व-वृक्ष के नीचे बैठकर जप करे। इस प्रयोग से वाक्-सिद्धि मिलती है और लक्ष्मी स्थिर रहती है।

११॰ “ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय, महा-माया प्रयच्छति।।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजाते, वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु, मायान्तरा ताश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।
ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय………

उक्त मन्त्र का १२००० जप कर दशांश होम, तर्पण करे। इस प्रयोग से जिस वस्तु की या जिस मनुष्य की इच्छा हो, उसका आकर्षण होता है और वह अपने वश में रहता है। राजा या राज्य-कर्ताओं को वश करने के लिए ४८००० जप करना चाहिए।

१२॰ “ॐ वाग्वादिनी ॐ ऐं। उपैतु मां देवसखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्ति वृद्धिं ददातु मे। ॐ वाग्वादिनी ॐ ऐं।।”
उक्त मन्त्र का बत्तीस लाख बीस हजार जप करे। “ॐ अस्य श्रीसूक्तस्य ‘उपैतु मां॰’ मन्त्रस्य कुबेर ऋषिः, मणि-मालिनी लक्ष्मीः देवता, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीं ब्लूं क्लीं बीजानि ममाभीष्ट-कामना-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।’ इस प्रकार ‘विनियोग’, ऋष्यादि-न्यास’ कर ‘आं ह्रीं क्रों ऐं श्रीं आं ह्रं क्रौं ऐं’ इन ९ बीजों से कर-न्यास एवं ‘हृदयादि-न्यास’ करे। ध्यान- “राज-राजेश्वरीं लक्ष्मीं, वरदां मणि-मालिनीं। देवीं देव-प्रियां कीर्ति, वन्दे काम्यार्थ-सिद्धये।।”
मणि-मालिनी लक्ष्मी देवी की स्वर्ण की मूर्ति बनाकर, बिल्व-पत्र, दूर्वा, हल्दी, अक्षत, मोती, केवड़ा, चन्दन, पुष्प आदि से पूजन करे। ‘श्री-ललिता-सहस्त्रनाम-स्तोत्र’ के प्रत्येक नाम के साथ ‘श्रीं’ बीज लगाकर पूजन करे। सन्ध्यादि नित्य कर्म कर प्रयोग का प्रारम्भ करे। घी का दीप और गूगल का धूप करे। द्राक्षा, खजूर, केले, ईख, शहद, घी, दाड़िम, केरी, नारियल आदि जो प्राप्त हो, नैवेद्य में दे। प्रातः और मध्याह्न में १००० और रात्रि में २००० नित्य जप करे। ढाई साल में एक व्यक्ति बत्तीस लाख बीस हजार का जप पूर्ण कर सकता है। जप करने के लिए प्रवाल की माला ले। जप पूर्ण होने पर अपामार्ग की समिधा, धृत, खीर से दशांश होम कर मार्जन और ब्रह्म-भोज करे।
इस प्रयोग से कुबेर आदि देव साक्षात् या स्वप्न में दर्शन देते हैं और धन, सुवर्ण, रत्न, रसायन, औषधि, दिव्याञ्जन आदि देते हैं।

: १३॰ “ॐ ऐं ॐ सौः। क्षुत्-पिपासामला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्। ॐ ऐं ॐ सौः”
उक्त मन्त्र का ३२,००० जप करे। प्रतिदिन रात्रि में वीरासन में बैठकर ३००० जप करे। ‘अग्नि-होत्र-कुण्ड’ के सम्मुख बैठकर ‘जप’ करने से विशेष फल मिलता है। रुद्राक्ष की माला से जप करे। तिल, गुड़ और घी से दशांश होम तथा तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोजन करावे। ध्यान- “खड्गं स-वात-चक्रं च, कमलं वरमेव च। करैश्चतुर्भिर्विभ्राणां, ध्याये चंद्राननां श्रियम्।।”
एक अनुष्ठान दस दिन में पूर्ण होगा। इस प्रकार चार अनुष्ठान पूरे करें।
इस प्रयोग से शत्रु का या बिना कारण हानि पहुँचानेवाले का नाश होगा और दरिद्रता, निर्धनता, रोग, भय आदि नष्ट होकर प्रयोग करने वाला अपने कुटुम्ब के साथ दीर्घायुषी और ऐश्वर्यवान् होता है। ग्रह-दोषों का अनिष्ट फल, कारण और क्षुद्र तत्वों की पीड़ा आदि नष्ट होकर भाग्योदय होता है।

१४॰ “रोगानशेषानपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम्, त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।
क्षुत्-पिपासामला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहं। अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम्, त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।”
उक्त मन्त्र का १००० जप रात्रि में करे। २०००० जप होने पर दशांश होम-काले तिल, सुपाड़ी, राई से करे। दशांश तर्पण, मार्जन आदि करे। शत्रु के विनाश के लिए, रोगों की शान्ति के लिए और विपत्तियों के निवारण के लिए यह उत्तम प्रयोग है। शत्रु-नाश के लिए रीठे के बीज की माला से काले ऊन के आसन पर वीरासन-मुद्रा से बैठकर क्रोध-मुद्रा में जप करे।

१५॰ “ॐ सौः ॐ हंसः। गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्। ॐ सौः ॐ हंसः।।”
उक्त मन्त्र का एक लाख साठ हजार जप करे। कमल-गट्टे की माला से कमल के आसन पर या कौशेय वस्त्र के आसन पर बैठकर जप करे। ‘स्थण्डिल’ पर केसर, कस्तुरी, चन्दन, कपूर आदि सुगन्धित द्रव्य रखकर श्रीलक्ष्मी देवी की मूर्ति की पूजा करे। जप पूर्ण होने पर खीर, कमल-पुष्प और तील से दशांश होम कर तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से धन-धान्य, समृद्धि, सोना-चाँदी, रत्न आदि मिलते हैं और सम्पन्न महानुभावों से बड़ा मान मिलता है।

१६॰ “ॐ हंसः ॐ आं। मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रुपममन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः। ॐ हंसः ॐ आं।।”
उक्त मन्त्र ८ लाख जपे। ‘ऐं-लं-वं-श्रीं’- को मन्त्र के साथ जोड़कर न्यास करे। यथा-
कर-न्यासः- ऐं-लं-वं-श्रीं मनसः अंगुष्ठाभ्यां नमः। ऐं-लं-वं-श्रीं काममाकूतिं तर्जनीभ्यां स्वाहा। ऐं-लं-वं-श्रीं वाचः सत्यमशीमहि मध्यमाभ्यां वषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं पशूनां अनामिकाभ्यां हुं। ऐं-लं-वं-श्रीं रुपममन्नस्य मयि कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं श्रीः श्रयतां यशः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्।
अंग-न्यासः- ऐं-लं-वं-श्रीं मनसः हृदयाय नमः। ऐं-लं-वं-श्रीं काममाकूतिं शिरसे स्वाहा। ऐं-लं-वं-श्रीं वाचः सत्यमशीमहि शिखायै वषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं पशूनां कवचाय हुं। ऐं-लं-वं-श्रीं रुपममन्नस्य मयि नेत्र-त्रयाय वौषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं श्रीः श्रयतां यशः अस्त्राय फट्।
ध्यानः- तां ध्यायेत् सत्य-संकल्पां, लक्ष्मीं क्षीरोदन-प्रियाम्।
ख्यातां सर्वेषु भूतेषु, तत्तद् ज्ञान-बल-प्रदाम्।।
उक्त धऽयतान करे। बिल्व फल, बिल्व-काष्ठ, पलाश की समिधा, घृत, तिल, शक्कर आदि से दशांश हवन कर तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से इच्छित वस्तु प्राप्त होती है और धन-धान्य, समृद्धि, व
लास बढ़ते हैं।

१७॰ “ॐ आं ॐ ह्रीं। कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।। ॐ आं ॐ ह्रीं।”
उक्त मन्त्र का ३२ लाख जप करे। मन्त्र के साथ ‘वं श्रीं’ बीज जोड़कर न्यास करे।
“स-वत्सा गौरिव प्रीता, कर्दमेन यथेन्दिरा। कल्याणी मद्-गृहे नित्यं, निवसेत् पद्म-मालिनी।।”
उक्त ध्यान करे। जीवित बछड़ेवाली गाय का और पुत्रवती, सौभाग्यवती स्त्रियों का पूजन करे। गो-शाला में बैठकर कमल-गट्टे की माला से जप करे। प्रतिदिन छोटे बच्चों को दूध पिलाए। जप पूर्ण होने पर दशांश होम, मार्जन, ब्रह्म-भोजन आदि करे।
इस प्रयोग से वन्ध्या स्त्री को भाग्य-शाली पुत्र होता है। वंश-वृद्धि होती है। होम शिव-लिंगी के बीज, खीर, श्वेत तिल, दूर्वा, घी से करे। तर्पण व मार्जन दूध से करे।

१८॰ “ॐ क्रौं ॐ क्लीं। आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलाङ पद्म-मालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवहम्।। ॐ क्रौं ॐ क्लीं”
उक्त मन्त्र प्रतिदिन ३००० जप करे। शुक्ल-पक्ष की पञ्चमी से प्रारम्भ कर पूर्णिमा तक जप करे। फिर दूसरे मास में शुक्ल पञ्चमी से पूर्णिमा तक जप करे। सम्भव हो, तो चन्द्र-मण्डल के सामने दृष्टि स्थिर रखकर जप करे। अथवा चन्द्रमा का प्रकाश अपने शरीर पर पड़ सके इस प्रकार बैठकर जप करे। रुद्राक्ष, कमल-गट्टे की माला से कौशेय वस्त्र या कमल-पुष्प-गर्भित आसन पर बैठकर जप करे। प्रयोग सोलह मास का है। ध्यान इस प्रकार करे-
“तां स्मरेदभिषेकार्द्रां, पुष्टिदां पुष्टि-रुपिणिम्। मैत्यादि-वृत्तिवभिश्चार्द्रां, विराजत्-करुणा श्रियम्।।
दयार्द्रां वेत्र-हस्तां च, व्रत-दण्ड-स्वरुपिणिम्। पिंगलाभां प्रसन्नास्यां पद्म-माला-धरां तथा।।
चन्द्रास्यां चन्द्र-रुपां च, चन्द्रां चन्द्रधरां तथा। हिरन्मयीं महा-लक्ष्मीमृचभेतां जपेन्निशि।।

: मन्त्र के अक्षर से विनियोग, ऋष्यादि-न्यास कर चन्द्र-मण्डल में भगवती का उक्त ध्यान कर सोलह मास का प्रयोग करना हो, तो शुक्ल पञ्चमी से प्रारम्भ करे। होम खीर, समिधा, कमल पुष्प, सफेद तिल, घृत, शहद आदि से करे। दशांश तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से वचन-सिद्धि, प्रतिष्ठा, वैभव की प्राप्ति होती है।

१९॰ “ॐ क्लीं ॐ। श्रीं आर्द्रां यः करिणीं यष्टि-सुवर्णां हेम-मालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो न आवह।। ॐ क्लीं ॐ”
उक्त मन्त्र के अनुष्ठान में तीन लाख साठ हजार जप करना होता है। तालाब के किनारे अथवा कमल पुष्पों के आसन पर बैठकर, कमल-गट्टे या स्वर्ण की माला में प्रति-दिन तीन हजार जप है। १२० दिन में प्रयोग पूर्ण होगा। खीर, कमल-पुष्प या घी आदि से दशांश होम करे। १०० सुवासिनी स्त्रियों को भोजन कराए और वस्त्र-भूषण, दक्षिणा दे। ध्यान निम्न प्रकार करे-
तां स्मरेदभिषेकार्द्रां, पुष्टिदां पुष्टि-रुपिणीं। रुक्माभां स्वप्न-धी-गम्यां, सुवर्णां स्वर्ण-मालिनी।।
सूर्यामैश्वर्य-रुपां च, सावित्रीं सूर्य-रुपिणीम्। आत्म-संज्ञां च चिद्रुपां, ज्ञान-दृष्टि-स्वरुपिणीं।
चक्षुः-प्राशदां चैव, हिरण्य-प्रचुरां तथा। स्वर्णात्मनाऽऽविर्भूतां च, जातवेदो म आवह।।
इस प्रयोग से ग्रहों की पीड़ा, ग्रह-बाधा-निवृत्ति होकर भाग्य का उदय होता है। अपना और अपने कुटुम्बियों के शरीर नीरोगी, दीर्घायुषी और प्रभावशाली होते हैं। जिससे मिलने की इच्छा हो, वह मनुष्य आ मिलता है।

२०॰ “ॐ श्रीं ॐ हूं। तां म आवह जातवेदो, लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो, दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहं।। ॐ श्रीं ॐ हूं”

‘ॐ अस्य श्री-पञ्च-दश-मन्त्र ऋचः कुबेरो ऋषिः, भूत-धात्री लक्ष्मी देवता, प्रस्तार-पंक्तिश्छन्दः, ह्रीं श्रीं ह्रीं इति बीजानि, ममाभीष्ट-फल-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः।’ इस प्रकार विनियोग कर ऋष्यादि-न्यास करे। ‘ह्रीं श्रीं ह्रीं’ यर बीज लगाकर अंग-न्यास तथा हृदयादि-न्यास करे। ध्यान इस प्रकार करें-
ध्याये लक्ष्मीं प्रहसित-मुखीं राज-सिंहासनस्थां। मुद्रा-शक्ति-सकल-विनुतां सर्व-संसेव्यनाम्।
अग्नौ पूज्यामखिल-जननीं हेम-वर्णां हिरण्यां। भाग्योपेतां भुवन-सुखदां भार्गवीं भुत-धात्रीम्।।
ज्वारी अथवा गेहूँ की राशि के ऊपर रतेशमी आसन बिछाकर, कमल-बीज की माला से नित्य तीन हजार जप करे। कुल सवा लाख जप करे। जप पूर्ण होने पर दूर्वा, खीर, मधु, घृत आदि से दशांश होम, तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से लक्ष्मी स्थिर रहती हैसूक्त के प्रयोग

१॰ “श्रीं ह्रीं क्लीं।।हिरण्य-वर्णा हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।। श्रीं ह्रीं क्लीं”
सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, ‘श्रीसूक्त’ की उक्त ‘हिरण्य-वर्णा॰॰’ ऋचा में ‘श्रीं ह्रीं क्लीं’ बीज जोड़कर प्रातः, दोपहर और सांय एक-एक हजार (१० माला) जप करे। इस प्रकार सवा लाख जप होने पर मधु और कमल-पुष्प से दशांश हवन करे और तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण-भोजन नियम से करे।
इस प्रयोग का पुरश्चरण ३२ लाख जप का है। सवा लाख का जप, होम आदि हो जाने पर दूसरे सवा लाख का जप प्रारम्भ करे। ऐसे कुल २६ प्रयोग करने पर ३२ लाख का प्रयोग सम्पूर्ण होता है।
इस प्रयोग का फल राज-वैभव, सुवर्ण, रत्न, वैभव, वाहन, स्त्री, सन्तान और सब प्रकार का सांसारिक सुख की प्राप्ति है।
२॰ “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।।
दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
ॐ ऐं हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।।”
यह ‘श्रीसूक्त का एक मन्त्र सम्पुटित हुआ। इस प्रकार ‘तां म आवह’ से लेकर ‘यः शुचिः’ तक के १६ मन्त्रों को सम्पुटित कर पाठ करने से १ पाठ हुआ। ऐसे १२ हजार पाठ करे। चम्पा के फूल, शहद, घृत, गुड़ का दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मा[2
: ॰ “ॐ ऐं ॐ ह्रीं।। तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरुषानहम्।। ॐ ऐं ॐ ह्रीं”
सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, नित्य सांय-काल एक हजार (१० माला) जप करे। कुल ३२ दिन का प्रयोग है। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे।
माँ लक्ष्मी स्वप्न में आकर धन के स्थान या धन-प्राप्ति के जो साधन अपने चित्त में होंगे, उनकी सफलता का मार्ग बताएँगी। धन-समृद्धि स्थिर रहेगी। प्रत्येक तीन वर्ष के अन्तराल में यह प्रयोग करे।

४॰ “ॐ ह्रीं ॐ श्रीं।। अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।। ॐ ह्रीं ॐ श्रीं”
उक्त मन्त्र का प्रातः, मध्याह्न और सांय प्रत्येक काल १०-१० माला जप करे। संकल्प, न्यास, ध्यान कर जप प्रारम्भ करे। इस प्रकार ४ वर्ष करने से मन्त्र सिद्ध होता है। प्रयोग का पुरश्चरण ३६ लाख मन्त्र-जप का है। स्वयं न कर सके, तो विद्वान ब्राह्मणों द्वारा कराया जा सकता है।
खोया हुआ या शत्रुओं द्वारा छिना हुआ धन प्राप्त होता है।

५॰ “करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।
अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।
करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।।”
उक्त आधे मन्त्र का सम्पुट कर १२ हजार जप करे। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे।
इससे धन, ऐश्वर्य, यश बढ़ता है। शत्रु वश में होते हैं। खोई हुई लक्ष्मी, सम्पत्ति पुनः प्राप्त होती है।

: ६॰ “ॐ श्रीं ॐ क्लीं।। कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।। ॐ श्रीं ॐ क्लीं”
उक्त मन्त्र का पुरश्चरण आठ लाख जप का है। जप पूर्ण होने पर पलाश, ढाक की समिधा, दूध और गाय के घी से हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोज करे।
इस प्रयोग से सभी प्रकार की समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है।

७॰ “सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।”
उक्त सम्पुट मन्त्र का १२ लाख जप करे। ब्राह्मण द्वारा भी कराया जा सकता है।
इससे गत वैभव पुनः प्राप्त होता है और धन-धान्य-समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है।

८॰ “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।।
दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।।”
उक्त प्रकार से सम्पुटित मन्त्र का १२ हजार जप करे।
इस प्रयोग से वैभव, लक्ष्मी, सम्पत्ति, वाहन, घर, स्त्री, सन्तान का लाभ मिलता है।

९॰ “ॐ क्लीं ॐ वद-वद।। चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।। ॐ क्लीं ॐ
वद-वद।।”

उक्त मन्त्र का संकल्प, न्यास, ध्यान कर एक लाख पैंतीस हजार जप करना चाहिए। गाय के गोबर से लिपे हुए स्थान पर बैठकर नित्य १००० जप करना चाहिए। यदि शीघ्र सिद्धि प्राप्त करना हो, तो तीनों काल एक-एक हजार जप करे या ब्राह्मणों से करावे। ४५ हजार पूर्ण होने पर दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे। ध्यान इस प्रकार है-
“अक्षीण-भासां चन्द्राखयां, ज्वलन्तीं यशसा श्रियम्।
देव-जुष्टामुदारां च, पद्मिनीमीं भजाम्यहम्।।”
इस प्रयोग से मनुष्य धनवान होता है।

१०॰ “ॐ वद वद वाग्वादिनि।। आदित्य-वर्णे! तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।। ॐ वद वद वाग्वादिनि”
देवी की स्वर्ण की प्रतिमा बनवाए। चन्दन, पुष्प, बिल्व-पत्र, हल्दी, कुमकुम से उसका पूजन कर एक से तीन हजार तक उक्त मन्त्र का जप करे। कुल ग्यारह लाख का प्रयोग है। जप पूर्ण होने पर बिल्व-पत्र, घी, खीर से दशांश होम, तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोजन करे। यह प्रयोग ब्राह्मणों द्वारा भी कराया जा सकता है। ‘ऐं क्लीं सौः ऐं श्रीं’– इन बीजों से कर-न्यास और हृदयादि-न्यास करे। ध्यान इस प्रकार करे- “उदयादित्य-संकाशां, बिल्व-कानन-मध्यगाम्। तनु-मध्यां श्रियं ध्यायेदलक्ष्मी-परिहारिणीम्।।”
प्रयोग-काल में फल और दूध का आहार करे। पकाया हुआ पदार्थ न खाए। पके हुए बिल्व-फल फलाहार में काए जा सकते हैं। यदि सम्भव हो तो बिल्व-वृक्ष के नीचे बैठकर जप करे। इस प्रयोग से वाक्-सिद्धि मिलती है और लक्ष्मी स्थिर रहती है।

११॰ “ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय, महा-माया प्रयच्छति।।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजाते, वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु, मायान्तरा ताश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।
ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय………

उक्त मन्त्र का १२००० जप कर दशांश होम, तर्पण करे। इस प्रयोग से जिस वस्तु की या जिस मनुष्य की इच्छा हो, उसका आकर्षण होता है और वह अपने वश में रहता है। राजा या राज्य-कर्ताओं को वश करने के लिए ४८००० जप करना चाहिए।

१२॰ “ॐ वाग्वादिनी ॐ ऐं। उपैतु मां देवसखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्ति वृद्धिं ददातु मे। ॐ वाग्वादिनी ॐ ऐं।।”
उक्त मन्त्र का बत्तीस लाख बीस हजार जप करे। “ॐ अस्य श्रीसूक्तस्य ‘उपैतु मां॰’ मन्त्रस्य कुबेर ऋषिः, मणि-मालिनी लक्ष्मीः देवता, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीं ब्लूं क्लीं बीजानि ममाभीष्ट-कामना-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः।’ इस प्रकार ‘विनियोग’, ऋष्यादि-न्यास’ कर ‘आं ह्रीं क्रों ऐं श्रीं आं ह्रं क्रौं ऐं’ इन ९ बीजों से कर-न्यास एवं ‘हृदयादि-न्यास’ करे। ध्यान- “राज-राजेश्वरीं लक्ष्मीं, वरदां मणि-मालिनीं। देवीं देव-प्रियां कीर्ति, वन्दे काम्यार्थ-सिद्धये।।”
मणि-मालिनी लक्ष्मी देवी की स्वर्ण की मूर्ति बनाकर, बिल्व-पत्र, दूर्वा, हल्दी, अक्षत, मोती, केवड़ा, चन्दन, पुष्प आदि से पूजन करे। ‘श्री-ललिता-सहस्त्रनाम-स्तोत्र’ के प्रत्येक नाम के साथ ‘श्रीं’ बीज लगाकर पूजन करे। सन्ध्यादि नित्य कर्म कर प्रयोग का प्रारम्भ करे। घी का दीप और गूगल का धूप करे। द्राक्षा, खजूर, केले, ईख, शहद, घी, दाड़िम, केरी, नारियल आदि जो प्राप्त हो, नैवेद्य में दे। प्रातः और मध्याह्न में १००० और रात्रि में २००० नित्य जप करे। ढाई साल में एक व्यक्ति बत्तीस लाख बीस हजार का जप पूर्ण कर सकता है। जप करने के लिए प्रवाल की माला ले। जप पूर्ण होने पर अपामार्ग की समिधा, धृत, खीर से दशांश होम कर मार्जन और ब्रह्म-भोज करे।
इस प्रयोग से कुबेर आदि देव साक्षात् या स्वप्न में दर्शन देते हैं और धन, सुवर्ण, रत्न, रसायन, औषधि, दिव्याञ्जन आदि देते हैं।

: १३॰ “ॐ ऐं ॐ सौः। क्षुत्-पिपासामला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्। ॐ ऐं ॐ सौः”
उक्त मन्त्र का ३२,००० जप करे। प्रतिदिन रात्रि में वीरासन में बैठकर ३००० जप करे। ‘अग्नि-होत्र-कुण्ड’ के सम्मुख बैठकर ‘जप’ करने से विशेष फल मिलता है। रुद्राक्ष की माला से जप करे। तिल, गुड़ और घी से दशांश होम तथा तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोजन करावे। ध्यान- “खड्गं स-वात-चक्रं च, कमलं वरमेव च। करैश्चतुर्भिर्विभ्राणां, ध्याये चंद्राननां श्रियम्।।”
एक अनुष्ठान दस दिन में पूर्ण होगा। इस प्रकार चार अनुष्ठान पूरे करें।
इस प्रयोग से शत्रु का या बिना कारण हानि पहुँचानेवाले का नाश होगा और दरिद्रता, निर्धनता, रोग, भय आदि नष्ट होकर प्रयोग करने वाला अपने कुटुम्ब के साथ दीर्घायुषी और ऐश्वर्यवान् होता है। ग्रह-दोषों का अनिष्ट फल, कारण और क्षुद्र तत्वों की पीड़ा आदि नष्ट होकर भाग्योदय होता है।

१४॰ “रोगानशेषानपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम्, त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।
क्षुत्-पिपासामला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहं। अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा, रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणाम्, त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।”
उक्त मन्त्र का १००० जप रात्रि में करे। २०००० जप होने पर दशांश होम-काले तिल, सुपाड़ी, राई से करे। दशांश तर्पण, मार्जन आदि करे। शत्रु के विनाश के लिए, रोगों की शान्ति के लिए और विपत्तियों के निवारण के लिए यह उत्तम प्रयोग है। शत्रु-नाश के लिए रीठे के बीज की माला से काले ऊन के आसन पर वीरासन-मुद्रा से बैठकर क्रोध-मुद्रा में जप करे।

१५॰ “ॐ सौः ॐ हंसः। गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्। ॐ सौः ॐ हंसः।।”
उक्त मन्त्र का एक लाख साठ हजार जप करे। कमल-गट्टे की माला से कमल के आसन पर या कौशेय वस्त्र के आसन पर बैठकर जप करे। ‘स्थण्डिल’ पर केसर, कस्तुरी, चन्दन, कपूर आदि सुगन्धित द्रव्य रखकर श्रीलक्ष्मी देवी की मूर्ति की पूजा करे। जप पूर्ण होने पर खीर, कमल-पुष्प और तील से दशांश होम कर तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से धन-धान्य, समृद्धि, सोना-चाँदी, रत्न आदि मिलते हैं और सम्पन्न महानुभावों से बड़ा मान मिलता है।

१६॰ “ॐ हंसः ॐ आं। मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रुपममन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः। ॐ हंसः ॐ आं।।”
उक्त मन्त्र ८ लाख जपे। ‘ऐं-लं-वं-श्रीं’- को मन्त्र के साथ जोड़कर न्यास करे। यथा-
कर-न्यासः- ऐं-लं-वं-श्रीं मनसः अंगुष्ठाभ्यां नमः। ऐं-लं-वं-श्रीं काममाकूतिं तर्जनीभ्यां स्वाहा। ऐं-लं-वं-श्रीं वाचः सत्यमशीमहि मध्यमाभ्यां वषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं पशूनां अनामिकाभ्यां हुं। ऐं-लं-वं-श्रीं रुपममन्नस्य मयि कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं श्रीः श्रयतां यशः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्।
अंग-न्यासः- ऐं-लं-वं-श्रीं मनसः हृदयाय नमः। ऐं-लं-वं-श्रीं काममाकूतिं शिरसे स्वाहा। ऐं-लं-वं-श्रीं वाचः सत्यमशीमहि शिखायै वषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं पशूनां कवचाय हुं। ऐं-लं-वं-श्रीं रुपममन्नस्य मयि नेत्र-त्रयाय वौषट्। ऐं-लं-वं-श्रीं श्रीः श्रयतां यशः अस्त्राय फट्।
ध्यानः- तां ध्यायेत् सत्य-संकल्पां, लक्ष्मीं क्षीरोदन-प्रियाम्।
ख्यातां सर्वेषु भूतेषु, तत्तद् ज्ञान-बल-प्रदाम्।।
उक्त धऽयतान करे। बिल्व फल, बिल्व-काष्ठ, पलाश की समिधा, घृत, तिल, शक्कर आदि से दशांश हवन कर तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से इच्छित वस्तु प्राप्त होती है और धन-धान्य, समृद्धि, व
लास बढ़ते हैं।

१७॰ “ॐ आं ॐ ह्रीं। कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।। ॐ आं ॐ ह्रीं।”
उक्त मन्त्र का ३२ लाख जप करे। मन्त्र के साथ ‘वं श्रीं’ बीज जोड़कर न्यास करे।
“स-वत्सा गौरिव प्रीता, कर्दमेन यथेन्दिरा। कल्याणी मद्-गृहे नित्यं, निवसेत् पद्म-मालिनी।।”
उक्त ध्यान करे। जीवित बछड़ेवाली गाय का और पुत्रवती, सौभाग्यवती स्त्रियों का पूजन करे। गो-शाला में बैठकर कमल-गट्टे की माला से जप करे। प्रतिदिन छोटे बच्चों को दूध पिलाए। जप पूर्ण होने पर दशांश होम, मार्जन, ब्रह्म-भोजन आदि करे।
इस प्रयोग से वन्ध्या स्त्री को भाग्य-शाली पुत्र होता है। वंश-वृद्धि होती है। होम शिव-लिंगी के बीज, खीर, श्वेत तिल, दूर्वा, घी से करे। तर्पण व मार्जन दूध से करे।

१८॰ “ॐ क्रौं ॐ क्लीं। आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलाङ पद्म-मालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवहम्।। ॐ क्रौं ॐ क्लीं”
उक्त मन्त्र प्रतिदिन ३००० जप करे। शुक्ल-पक्ष की पञ्चमी से प्रारम्भ कर पूर्णिमा तक जप करे। फिर दूसरे मास में शुक्ल पञ्चमी से पूर्णिमा तक जप करे। सम्भव हो, तो चन्द्र-मण्डल के सामने दृष्टि स्थिर रखकर जप करे। अथवा चन्द्रमा का प्रकाश अपने शरीर पर पड़ सके इस प्रकार बैठकर जप करे। रुद्राक्ष, कमल-गट्टे की माला से कौशेय वस्त्र या कमल-पुष्प-गर्भित आसन पर बैठकर जप करे। प्रयोग सोलह मास का है। ध्यान इस प्रकार करे-
“तां स्मरेदभिषेकार्द्रां, पुष्टिदां पुष्टि-रुपिणिम्। मैत्यादि-वृत्तिवभिश्चार्द्रां, विराजत्-करुणा श्रियम्।।
दयार्द्रां वेत्र-हस्तां च, व्रत-दण्ड-स्वरुपिणिम्। पिंगलाभां प्रसन्नास्यां पद्म-माला-धरां तथा।।
चन्द्रास्यां चन्द्र-रुपां च, चन्द्रां चन्द्रधरां तथा। हिरन्मयीं महा-लक्ष्मीमृचभेतां जपेन्निशि।।

: मन्त्र के अक्षर से विनियोग, ऋष्यादि-न्यास कर चन्द्र-मण्डल में भगवती का उक्त ध्यान कर सोलह मास का प्रयोग करना हो, तो शुक्ल पञ्चमी से प्रारम्भ करे। होम खीर, समिधा, कमल पुष्प, सफेद तिल, घृत, शहद आदि से करे। दशांश तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से वचन-सिद्धि, प्रतिष्ठा, वैभव की प्राप्ति होती है।

१९॰ “ॐ क्लीं ॐ। श्रीं आर्द्रां यः करिणीं यष्टि-सुवर्णां हेम-मालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो न आवह।। ॐ क्लीं ॐ”
उक्त मन्त्र के अनुष्ठान में तीन लाख साठ हजार जप करना होता है। तालाब के किनारे अथवा कमल पुष्पों के आसन पर बैठकर, कमल-गट्टे या स्वर्ण की माला में प्रति-दिन तीन हजार जप है। १२० दिन में प्रयोग पूर्ण होगा। खीर, कमल-पुष्प या घी आदि से दशांश होम करे। १०० सुवासिनी स्त्रियों को भोजन कराए और वस्त्र-भूषण, दक्षिणा दे। ध्यान निम्न प्रकार करे-
तां स्मरेदभिषेकार्द्रां, पुष्टिदां पुष्टि-रुपिणीं। रुक्माभां स्वप्न-धी-गम्यां, सुवर्णां स्वर्ण-मालिनी।।
सूर्यामैश्वर्य-रुपां च, सावित्रीं सूर्य-रुपिणीम्। आत्म-संज्ञां च चिद्रुपां, ज्ञान-दृष्टि-स्वरुपिणीं।
चक्षुः-प्राशदां चैव, हिरण्य-प्रचुरां तथा। स्वर्णात्मनाऽऽविर्भूतां च, जातवेदो म आवह।।
इस प्रयोग से ग्रहों की पीड़ा, ग्रह-बाधा-निवृत्ति होकर भाग्य का उदय होता है। अपना और अपने कुटुम्बियों के शरीर नीरोगी, दीर्घायुषी और प्रभावशाली होते हैं। जिससे मिलने की इच्छा हो, वह मनुष्य आ मिलता है।

२०॰ “ॐ श्रीं ॐ हूं। तां म आवह जातवेदो, लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो, दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहं।। ॐ श्रीं ॐ हूं”

‘ॐ अस्य श्री-पञ्च-दश-मन्त्र ऋचः कुबेरो ऋषिः, भूत-धात्री लक्ष्मी देवता, प्रस्तार-पंक्तिश्छन्दः, ह्रीं श्रीं ह्रीं इति बीजानि, ममाभीष्ट-फल-प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः।’ इस प्रकार विनियोग कर ऋष्यादि-न्यास करे। ‘ह्रीं श्रीं ह्रीं’ यर बीज लगाकर अंग-न्यास तथा हृदयादि-न्यास करे। ध्यान इस प्रकार करें-
ध्याये लक्ष्मीं प्रहसित-मुखीं राज-सिंहासनस्थां। मुद्रा-शक्ति-सकल-विनुतां सर्व-संसेव्यनाम्।
अग्नौ पूज्यामखिल-जननीं हेम-वर्णां हिरण्यां। भाग्योपेतां भुवन-सुखदां भार्गवीं भुत-धात्रीम्।।
ज्वारी अथवा गेहूँ की राशि के ऊपर रतेशमी आसन बिछाकर, कमल-बीज की माला से नित्य तीन हजार जप करे। कुल सवा लाख जप करे। जप पूर्ण होने पर दूर्वा, खीर, मधु, घृत आदि से दशांश होम, तर्पण, मार्जन आदि करे।
इस प्रयोग से लक्ष्मी स्थिर रहती है. 💐 #श्रीसूक्त #का #दीपावली #में #प्रयोग 💐

१॰ “श्रीं ह्रीं क्लीं।।हिरण्य-वर्णा हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।। श्रीं ह्रीं क्लीं”
सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, ‘श्रीसूक्त’ की उक्त ‘हिरण्य-वर्णा॰॰’ ऋचा में ‘श्रीं ह्रीं क्लीं’ बीज जोड़कर प्रातः, दोपहर और सांय एक-एक हजार (१० माला) जप करे। इस प्रकार सवा लाख जप होने पर मधु और कमल-पुष्प से दशांश हवन करे और तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण-भोजन नियम से करे।
इस प्रयोग का पुरश्चरण ३२ लाख जप का है। सवा लाख का जप, होम आदि हो जाने पर दूसरे सवा लाख का जप प्रारम्भ करे। ऐसे कुल २६ प्रयोग करने पर ३२ लाख का प्रयोग सम्पूर्ण होता है।
इस प्रयोग का फल राज-वैभव, सुवर्ण, रत्न, वैभव, वाहन, स्त्री, सन्तान और सब प्रकार का सांसारिक सुख की प्राप्ति है।
२॰ “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।।
दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
ॐ ऐं हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महा-लक्ष्म्यै नमः।।”
यह ‘श्रीसूक्त का एक मन्त्र सम्पुटित हुआ। इस प्रकार ‘तां म आवह’ से लेकर ‘यः शुचिः’ तक के १६ मन्त्रों को सम्पुटित कर पाठ करने से १ पाठ हुआ। ऐसे १२ हजार पाठ करे। चम्पा के फूल, शहद, घृत, गुड़ का दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मा[2
: ॰ “ॐ ऐं ॐ ह्रीं।। तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरुषानहम्।। ॐ ऐं ॐ ह्रीं”
सुवर्ण से लक्ष्मी की मूर्ति बनाकर उस मूर्ति का पूजन हल्दी और सुवर्ण-चाँदी के कमल-पुष्पों से करें। फिर सुवासिनी-सौभाग्यवती स्त्री और गाय का पूजन कर, पूर्णिमा के चन्द्र में अथवा पानी से भरे हुए कुम्भ में श्रीपरा-नारायणी का ध्यान कर, सोने की माला से कमल-पत्र के आसन पर बैठकर, नित्य सांय-काल एक हजार (१० माला) जप करे। कुल ३२ दिन का प्रयोग है। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे।
माँ लक्ष्मी स्वप्न में आकर धन के स्थान या धन-प्राप्ति के जो साधन अपने चित्त में होंगे, उनकी सफलता का मार्ग बताएँगी। धन-समृद्धि स्थिर रहेगी। प्रत्येक तीन वर्ष के अन्तराल में यह प्रयोग करे।

४॰ “ॐ ह्रीं ॐ श्रीं।। अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।। ॐ ह्रीं ॐ श्रीं”
उक्त मन्त्र का प्रातः, मध्याह्न और सांय प्रत्येक काल १०-१० माला जप करे। संकल्प, न्यास, ध्यान कर जप प्रारम्भ करे। इस प्रकार ४ वर्ष करने से मन्त्र सिद्ध होता है। प्रयोग का पुरश्चरण ३६ लाख मन्त्र-जप का है। स्वयं न कर सके, तो विद्वान ब्राह्मणों द्वारा कराया जा सकता है।
खोया हुआ या शत्रुओं द्वारा छिना हुआ धन प्राप्त होता है।

५॰ “करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।
अश्व-पूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।
करोतु सा नः शुभ हेतुरीश्वरी, शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।।”
उक्त आधे मन्त्र का सम्पुट कर १२ हजार जप करे। दशांश हवन, तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे।
इससे धन, ऐश्वर्य, यश बढ़ता है। शत्रु वश में होते हैं। खोई हुई लक्ष्मी, सम्पत्ति पुनः प्राप्त होती है।

: ६॰ “ॐ श्रीं ॐ क्लीं।। कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।। ॐ श्रीं ॐ क्लीं”
उक्त मन्त्र का पुरश्चरण आठ लाख जप का है। जप पूर्ण होने पर पलाश, ढाक की समिधा, दूध और गाय के घी से हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोज करे।
इस प्रयोग से सभी प्रकार की समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है।

७॰ “सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
सर्वा-बाधा-प्रशमनं, त्रैलोक्याखिलेश्वरि! एवमेव त्वया कार्यमस्मद्-वैरि-विनाशनम्।।”
उक्त सम्पुट मन्त्र का १२ लाख जप करे। ब्राह्मण द्वारा भी कराया जा सकता है।
इससे गत वैभव पुनः प्राप्त होता है और धन-धान्य-समृद्धि और श्रेय मिलता है। शत्रुओं का क्षय होता है।

८॰ “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।।
दुर्गे! स्मृता हरसि भीतिमशेष-जन्तोः, स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव-शुभां ददासि।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
दारिद्रय-दुःख-भय-हारिणि का त्वदन्या, सर्वोपकार-करणाय सदाऽर्द्र-चित्ता।।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं।।कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद महा-लक्ष्म्यै नमः।।”
उक्त प्रकार से सम्पुटित मन्त्र का १२ हजार जप करे।
इस प्रयोग से वैभव, लक्ष्मी, सम्पत्ति, वाहन, घर, स्त्री, सन्तान का लाभ मिलता है।

९॰ “ॐ क्लीं ॐ वद-वद।। चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे।। ॐ क्लीं ॐ
वद-वद।।”

उक्त मन्त्र का संकल्प, न्यास, ध्यान कर एक लाख पैंतीस हजार जप करना चाहिए। गाय के गोबर से लिपे हुए स्थान पर बैठकर नित्य १००० जप करना चाहिए। यदि शीघ्र सिद्धि प्राप्त करना हो, तो तीनों काल एक-एक हजार जप करे या ब्राह्मणों से करावे। ४५ हजार पूर्ण होने पर दशांश हवन तद्दशांश तर्पण, मार्जन तथा ब्रह्म-भोजन करे। ध्यान इस प्रकार है-
“अक्षीण-भासां चन्द्राखयां, ज्वलन्तीं यशसा श्रियम्।
देव-जुष्टामुदारां च, पद्मिनीमीं भजाम्यहम्।।”
इस प्रयोग से मनुष्य धनवान होता है।

१०॰ “ॐ वद वद वाग्वादिनि।। आदित्य-वर्णे! तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।। ॐ वद वद वाग्वादिनि”
देवी की स्वर्ण की प्रतिमा बनवाए। चन्दन, पुष्प, बिल्व-पत्र, हल्दी, कुमकुम से उसका पूजन कर एक से तीन हजार तक उक्त मन्त्र का जप करे। कुल ग्यारह लाख का प्रयोग है। जप पूर्ण होने पर बिल्व-पत्र, घी, खीर से दशांश होम, तर्पण, मार्जन, ब्रह्म-भोजन करे। यह प्रयोग ब्राह्मणों द्वारा भी कराया जा सकता है। ‘ऐं क्लीं सौः ऐं श्रीं’– इन बीजों से कर-न्यास और हृदयादि-न्यास करे। ध्यान इस प्रकार करे- “उदयादित्य-संकाशां, बिल्व-कानन-मध्यगाम्। तनु-मध्यां श्रियं ध्यायेदलक्ष्मी-परिहारिणीम्।।”
प्रयोग-काल में फल और दूध का आहार करे। पकाया हुआ पदार्थ न खाए। पके हुए बिल्व-फल फलाहार में काए जा सकते हैं। यदि सम्भव हो तो बिल्व-वृक्ष के नीचे बैठकर जप करे। इस प्रयोग से वाक्-सिद्धि मिलती है और लक्ष्मी स्थिर रहती है।

११॰ “ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय, महा-माया प्रयच्छति।।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजाते, वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु, मायान्तरा ताश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।
ज्ञानिनामपि चेतांसि, देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय………

उक्त मन्त्र का १२००० जप कर दशांश होम, तर्पण करे। इस प्रयोग से जिस वस्तु की या जिस मनुष्य की इच्छा हो, उसका आकर्षण होता है और वह अपने वश में रहता है। राजा या राज्य-कर्ताओं को वश करने के लिए ४८००० जप करना चाहिए।

१२॰ “ॐ वाग्वादिनी ॐ ऐं। उपैतु मां देवसखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
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💐 #दिवाली #की #जानकारी 💐

दिवाली या कहें दीपावली भारतवर्ष में मनाया जाने वाला हिंदूओं का एक ऐसा पर्व है जिसके बारे में लगभग सब जानते हैं। प्रभु श्री राम की अयोध्या वापसी पर लोगों ने उनका स्वागत घी के दिये जलाकर किया। अमावस्या की काली रात रोशन भी रोशन हो गई। अंधेरा मिट गया उजाला हो गया यानि कि अज्ञानता के अंधकार को समाप्त कर ज्ञान का प्रकाश हर और फैलने लगा। इसलिये दिवाली को प्रकाशोत्सव भी कहा जाता है। दिवाली का त्यौहार जब आता है तो साथ में अनेक त्यौहार लेकर आता है। एक और यह जीवन में ज्ञान रुपी प्रकाश को लाने वाला है तो वहीं सुख-समृद्धि की कामना के लिये भी दिवाली से बढ़कर कोई त्यौहार नहीं होता इसलिये इस अवसर पर लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। दीपदान, धनतेरस, गोवर्धन पूजा, भैया दूज आदि त्यौहार दिवाली के साथ-साथ ही मनाये जाते हैं। सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक हर लिहाज से दिवाली बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है। वर्तमान में तो इस त्यौहार ने धार्मिक भेदभाव को भी भुला दिया है और सभी धर्मों के लोग इसे अपने-अपने तरीके से मनाने लगे हैं। हालांकि पूरी दुनिया में दिवाली से मिलते जुलते त्यौहार अलग-अलग नामों से मनाये जाते हैं लेकिन भारतवर्ष में विशेषकर हिंदूओं में दिवाली का त्यौहार बहुत मायने रखता है।

. #दिवाली और #लक्ष्मीपूजा

माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिये इस दिन को बहुत ही शुभ माना जाता है। घर में सुख-समृद्धि बने रहे और मां लक्ष्मी स्थिर रहें इसके लिये दिनभर मां लक्ष्मी का उपवास रखने के उपरांत सूर्यास्त के पश्चात प्रदोष काल के दौरान स्थिर लग्न (वृषभ लग्न को स्थिर लग्न माना जाता है) में मां लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिये। लग्न व मुहूर्त का समय स्थान के अनुसार ही देखना चाहिये।

. #दिवालीपर्व #तिथि व #मुहूर्त
. 19 -10--2017

. #लक्ष्मीपूजा #मुहूर्त- 18:27 से 20:09
. #प्रदोषकाल- 17:33 से 20:09
. #वृषभकाल- 18:27 से 20:22

#अमावस्यातिथि #आरंभ- 20:40 (29 अक्तूबर)

#अमावस्यातिथि #समाप्त- 23:08 (30 अक्तूबर)

. #लक्ष्मीमाता को #प्रसन्न करने के लिए #निम्नमंत्र का #जाप करें :--

ॐ आद्यलक्ष्म्यै नम:,
ॐ विद्यालक्ष्म्यै नम:,
ॐ सौभाग्यलक्ष्म्यै नम:,
ॐ अमृतलक्ष्म्यै नम:,
ॐ कामलक्ष्म्यै नम:,
ॐ सत्यलक्ष्म्यै नम:,
ॐ भोगलक्ष्म्यै नम:,
ॐ योगलक्ष्म्यै नम:.
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

. --: #पूजा #सामाग्री:--

मां लक्ष्मी की पूजा से पहले थाली में कलावा, अक्षत, लाल वस्त्र, फूल, पांच सुपारी, रोली, सिंदूर, एक नारियल, अक्षत, लाल वस्त्र, फूल, पांच सुपारी, लौंग, पान के पत्ते, घी, कलश, कलश के लिए आम का पल्लव, चौकी, समिधा, हवन कुण्ड, हवन सामग्री, कमल गट्टे, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल), फल, बताशे, मिठाईयां, पूजा में बैठने हेतु आसन, हल्दी , अगरबत्ती, कुमकुम, इत्र, दीपक, रूई, आरती की थाली, कुशा, रक्त चंदनद, श्रीखंड चंदन पूजन सामग्री को आवश्य रख लें ।

. --: #पूजनविधि:-
मां लक्ष्मी की पूजा शुरू करने से पहले चौकी को धोकर रंगोली बना लें और फिर चौकी के चारों तरफ दीपक जलाएं. मां की मूर्ति को जहां भी स्थापित करने जा रहे हैं वहां थोड़े से चावल भी जरूर डालें. मां को प्रसन्‍न करने के लिए उनके बाईं ओर भगवान विष्‍णु की मूर्ति को स्‍थापित करें. पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर दीपावली पूजन के लिए संकल्प लें !

. #पँ०हिमांशु #मिश्रा
. 7739792520

. #लक्ष्मीपतिबिष्णु के #साथ #महालक्ष्मी
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www.ambikabhawani.in
#बेवसाइट का #विमोचन की #दीप #जलाकर #उदघाट्न करतें #श्री #उपेन्द्र #कुशवाहा ,#राज्य #मंत्री,#भारत-#सरकार,
#पँ०हिमांशु #मिश्र,
#राष्ट्रपति #द्वारा #सम्मानित
" #समाज #सेवी "
#बिधायक-#श्री #ललन #पासवान, #बिधायिका-#श्रीमती #मुन्नी #देवी ,
#बरिष्ठ #साहित्यकार #डॉ०रबिन्द्र राजहंस !
डॉ नरेश पाण्डे "चकोर" !
श्री राज नाथ मिश्र ,अध्यक्ष,बहुभाषीय ब्राह्मण संघ!
अम्बिका देवी भक्त डॉ शिव बचन सिंह -आमी ।
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🌸#कन्यापूजन #किस #उम्र की #बच्चियों #का🌸

. #ॐ #नमः #चण्डिकाय


#एकवर्षा #न #कर्तव्या #कन्या #पूजाविधौ #नृप ।
#परमज्ञा #तु #भोगानां #गन्धादीनां #च #बालिका ।।
#अत #ऊर्ध्वं #न #कर्तव्या #सर्वकार्यविगर्हिता ।।
#देवीभागवत ३/२६/४०,४३

व्यासजी कहते है- नवरात्री में कन्यापूजन में एक वर्ष की अवस्था वाली कन्या नहीं लेना चाहिए क्योंकि वह गंध और खाद्य पदार्थों के स्वाद से बिल्कुल अनभिज्ञ रहती है । दस वर्ष के ऊपर की अवस्था वाली कन्या का पूजन नहीं करना चाहिए क्योंकि वह सभी कार्यों में निन्दनीय मानी जाती है ।"

. #जय #माँ #अम्बिकाभवानी
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۝ भगवान श्री बद्री विशाल नाथ मंदिर , ۝

भारतबर्ष में सनातन धर्म में सर्वोच्चय धर्म स्थान श्री बद्रीनारायण मंदिर को माना जाता है यह स्थान अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य के चमोली जिला में स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है। यह हिन्दुओं के चार धाम में से एक धाम भी है। ऋषिकेष से यह २९४ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । ये पंच-बद्री में से एक बद्री हैं। उत्तराखंड में पंच बद्री, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिन्दू धर्म दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
• पौराणिक कथाओं में उल्लिखित सांप(साँपों का जोड़ा)
• शेषनाग की कथित छाप वाला एक शिलाखंड – शेषनेत्र
• चरणपादुका- जिसके बारे में कहा जाता है कि यह भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं;(यहीं भगवान विष्णु ने बालरूप में अवतरण किया था। )
• बद्रीनाथ से नज़र आने वाला बर्फ़ से ढंका ऊँचा शिखर नीलकंठ, जो 'गढ़वाल क्वीन' के नाम से जाना जाता है।
• माता मूर्ति मंदिर:- जिन्हें बद्रीनाथ भगवान जी की माता के रूप में पूजा जाता है।
• माणा गाँव: इसे भारत का अंतिम गाँव भी कहा जाता है।
• वेद व्यास गुफा,गणेश गुफा: यहीं वेदों और उपनिषदों का व्याख्यान और लेखन हुआ था ।

!! बिशेष श्राद्ध जिससे पितर मुक्ति !!
ब्रह्म कपाल :- यहाँ पितर की मोक्ष हेतु ,ब्रह्मकपाली श्राद्ध करने से सभी सात पुस्त के पितरो का मोक्ष हो जाता है,और पितर दोष से व्यक्ति मुक्त हो जाता है ।

🔔 *श्रीबद्री बिशाल जी की आरती* 🔔

पवन मंद सुगन्ध शीतल,हेम मंदिर शोभितम,
निकट गंगा बहत निर्मल बद्रीनाथ बिशब्भरम ।
शेष सुमिरन करत निसदिन धरत ध्यान महेश्वरम,
वेद ब्रह्मा करत स्तुति श्री बद्रीनाथ बिश्वभरम ।
शक्ति गौरी गणेश शारद नारद मुनि उच्चारनम,
योग ध्यान अपार लीला श्री बद्रीनाथ बिश्वभरम ।
इंद्र,चन्द्र,कुवेर,दिनकर धूप-दीप प्रकाशितम,
सिद्ध मुनिजन करत जय जय श्रीबद्रीनाथ बिश्वभरम ।
यक्ष,किन्नर करत कौतुक ज्ञान गन्धर्व प्रकाशितम ,
श्रीलक्ष्मी-कमला चवर डोले श्रीबद्रीनाथ बिश्वभरम ।
कैलाश में एक देव निरंजन शैल शिखर महेश्वरम ,
राजा युधिष्ठिर करत स्तुति श्रीबद्रीनाथ बिश्वभरम ।
श्रीबद्री जी की पंचरत्न पढ़त पाप विनाशनम ,
कोटि तीर्थ प्रभूत पुण्यम प्राप्यते फलदायकम ।।

!! पँ०हिमांशु मिश्र। !!
. ७७३९७९२५२०
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