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विश्व मानव कल्याण ट्रस्ट

🙏. ✍ #ज्ञान #मंथन 🙏

. 📖 #चारवेद
1:= ऋग्वेद , 2:= सामवेद
3:= अथर्ववेद , 4:= यजुर्वेद
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. #कुल #शास्त्र
1:= वेदांग , 2:= सांख्य ,
3:= निरूक्त , 4'= व्याकरण ,
5:= योग , 6:= छंद ,
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. #नदियां।
1:= गंगा , 2:= यमुना ,
3:= गोदावरी , 4:= सरस्वती ,
5:= नर्मदा ,6:= सिंधु ,
. 7:= कावेरी
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. 📚 18 पुराण।
1:= मत्स्य पुराण ,
2:=मार्कण्डेय पुराण ,
3:= भविष्य पुराण
4:= भगवत पुराण,
5:= ब्रह्मांड पुराण ,
6:= ब्रह्मवैवर्त पुराण ,
7:= ब्रह्म पुराण ,
8] वामन पुराण ,
9] वराह पुराण ,
10:= विष्णु पुराण,
11:= वायु पुराण ,
12:= अग्नि पुराण ,
13:= नारद पुराण ,
14:= पद्म पुराण ,
15:= लिंग पुराण ,
16:= गरुड़ पुराण ,
17:= कूर्म पुराण
18:= स्कंद पुराण
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. #पंचामृत।
1:= दूध , 2:= दहीं , 3:= घी ,
4:= मध, 5:= साकर ,
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. 🌌 #पंचतत्व।
1:= पृथ्वी , 2:= जल , 3:= तेज ,
4:= वायु , 5:= आकाश
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. #तीनगुण।
1:= सत्व् ,2:= रज् , 3:= तम् ,
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. #तीन #रोगदोष।
1:= वात् , 2:= पित्त् , 3:= कफ
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. #तीनलोक।
1:= आकाश लोक , 2:= मृत्यु लोक , 3:= पाताल लोक ,
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. #महासागर।
1:= क्षीरसागर , 2:= दधिसागर ,
3:= घृतसागर , 4:= मथानसागर ,
5:= मधुसागर 6:= मदिरासागर
. 7:= लवणसागर
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. #सातद्वीप।
1:= जम्बू द्वीप , 2:= पलक्ष द्वीप ,
3:= कुश द्वीप , 4:= पुष्कर द्वीप ,
5:= शंकर द्वीप ,6:= कांच द्वीप ,
. 7:= शालमाली द्वीप
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. #तीनदेव।
1:= ब्रह्मा , 2:= विष्णु ,
. 3:= महेश
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. #तीनजीव।
1:= जलचर , 2:= नभचर ,
3:= थलचर ,
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. #चारवर्ण।
1 := ब्राह्मण , 2:= क्षत्रिय
3:= वैश्य , 4]:= शूद्र
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. 🚩 #चारफल (#पुरुषार्थ)।
1:= धर्म , 2:= अर्थ
3:= काम ,. 4:= मोक्ष
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. #चार #शत्रु।
1:= काम , 2:= क्रोध
3:= मोह , 4:= लोभ
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. #चार #आश्रम।
1:= ब्रह्मचर्य , 2:= गृहस्थ
3:=वानप्रस्थ , 4:= संन्यास
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. #अष्टधातु।
1:= सोना,2:= चांदी, 3:= तांबा,
4:= लोह , 5:= सीसु '6:= कांस्य ,
7:= पित्तल , 8:= रांगु ,
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. #पंचदेव।
1:= ब्रह्मा , 2:= विष्णु, 3:= महेश
4:= गणेश , 5:= सूर्य
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. #चौदह #रत्न
1:= अमृत , 2:=अैरावत हाथी
3:= कल्पवृक्ष , 4:= कौस्तुभ मणी
5:= उच्चै:श्रवा अश्व, 6:= पांचजन्य शंख , 7:= चंद्रमा ,
8:= धनुष , 9:= कामधेनु गाय
10:= धनवंतरी,11:= रंभा अप्सरा, 12:=लक्ष्मी माताजी
13:= वारुणी ,14:= वृष
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. #नवधा #भक्ति।
1:= श्रवण,2:= कीर्तन,3:=स्मरण
4:= पादसेवन, 5:= अर्चना 6:= वंदना , 7:= मित्र , 8:= दास्य
9] आत्मनिवेदन
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. 🌍 #चौदह #भुवन।
1:= तल , 2:= अतल , 3 := वितल ,4 := सुतल , 5 :=रसातल
6:=पाताल ,7:= भुवलोक
8:= भुलोक ,9:= स्वर्ग ,10:= मृत्युलोक11:= यमलोक
12:= वरुणलोक ,13:=सत्यलोक
14:= ब्रह्मलोक.

यह धार्मिक बातें अपने बच्चों को बताइये , ताकि सनातन धर्म की जानकारियाँ रहे । जय हिंदू राष्ट्र ।

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. #हनुमानचालीसा #अर्थ #सहित

क्या हमे चालीसा पढते समय पता भी होता है कि हम हनुमानजी से क्या कह रहे हैं या क्या मांग रहे हैं ? बस रटा रटाया बोलते जाते हैं। आनंद और फल शायद तभी मिलेगा जब हमें इसका मतलब भी पता हो।

#तो #पेश #है #श्रीहनुमानचालीसा #अर्थ #सहित!!

. #ॐॐॐ
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
अर्थ:-- गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।
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बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।
अर्थ:-- हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।
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जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥
अर्थ :-- श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।
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राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥
अर्थ:-- हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।
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महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥
अर्थ:-- हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।
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कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥
अर्थ:-- आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।
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हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥
अर्थ:-- आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।
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शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥
अर्थ :-- हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।
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विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥
अर्थ :-- आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।
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प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥
अर्थ :-- आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।
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सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥
अर्थ:-- आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।
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भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥
अर्थ :-- आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।
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लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥
अर्थ :--आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।
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रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥
अर्थ :-- श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।
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सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥
अर्थ :-- श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।
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सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥
अर्थ :--श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।
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जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥
अर्थ :-- यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।
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तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥
अर्थ :-- आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।
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तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥
अर्थ :-- आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।
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जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥
अर्थ :-- जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।
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प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥
अर्थ :-- आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।
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दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥
अर्थ :-- संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।
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राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥
अर्थ :-- श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।
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सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥
अर्थ :-- जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।
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आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥
अर्थ. :-- आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।
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भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥
अर्थ :-- जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।
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नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥
अर्थ :--वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।
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संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥
अर्थ :-- हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।
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सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥
अर्थ :-- तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।
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और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥
अर्थ :--जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नहीलहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥
अर्थ :-- चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।
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साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥
अर्थ :-- हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।
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अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
अर्थ :-- आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।
1.:- अणिमा :-- जिससे साधक किसी को दिखाई नही पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ मे प्रवेश कर.जाता है।
2.:- महिमा :-- जिसमे योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।
3.:- गरिमा :-- जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।
4.:- लघिमा :-- जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।
5.:- प्राप्ति :-- जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।
6.:- प्राकाम्य :-- जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी मे समा सकता है, आकाश मे उड़ सकता है।
7.:- ईशित्व :-- जिससे सब पर शासन का सामर्थय हो जाता है।
8.:-- वशित्व :- जिससे दूसरो को वश मे किया जाता है।
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राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥
अर्थ :-- आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।
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तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥
अर्थ :-- आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।
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अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥
अर्थ :-- अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।
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और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥
अर्थ:-- हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।
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संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥
अर्थ :-- हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।
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जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥
अर्थ :-- हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।
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जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥
अर्थ :- जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।
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जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥अर्थ :-- भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।*****************
तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥
अर्थ :-- हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।
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पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
अर्थ :- हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।

. #माँसीता-#श्रीराम #दुत #हनुमानजी #को #समर्पित
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. 👌 #माँ #अम्बिकाभवानी 👌

"अम्बिके त्वम् जगत् माता ,अम्बिके त्वम् जगत् पिता ,अम्बिके त्वम् जगत्,धात्री, श्री अम्बिकाय नमो नमःl l"
ईश्वर की कृपा प्राप्त करने क़े लिए देवी माँ की पूजा सबसे शक्तिशाली विधि है l स्त्री भगवान की एक महान कृति है ,विश्व का सार ,पुरूष की प्रिय संगिनी और सहयोगी है l स्त्री चैतन्य माया है l वह भगवान की ऊर्जा है l वह आदि शक्ति की सन्तान है l उसके पास इस विश्व की कुँजी है l वह बच्चों की भाग्य विधात्री है l
स्त्री सौम्यता,कोमलता और लालित्य का रहस्यमय मिश्रण है l उसमे सेवा,धैय और प्रेम का अद्भुत संयोग होता है l वह माधुर्य सॆ पूर्ण होती है l वह माया का मोहक आकर्षण और जादू है l वह करुणा और दया की मूर्ति है वह मातृ -प्रेम का मूर्त रूप है l वह क्षमा का सागर है l चाहे वह देवी माँ हो,या मेरी माँ,जहाँ भी माँ की ऊर्जा है,वह सदा प्रेम और दया का मूर्त रूप होगी l उसका सच्चा रूप है क्षमा,संतान चाहे कितनी भी शरारती या दुष्ट हो l वह मातृत्व की महिमा से को प्रकाशित कर देती है l
यही देवी माँ का मूल रूप है l -जय माँ, तेरा ही सदा आसरा है,सदा अपने सानिध्य में जीवन मुझे रखना l
अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गीमुनिपूजिता॥
ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः॥

. पँ०हिमांशु मिश्र,
. 7739792520,
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🏵 #रामनवमी #पर #श्रीहनुमान #जी #की #विशेष #मन्त्र 🏵

" #ॐ #हनुमन्ते #नमः " जो मानव रामायण और हनुमान चलीसा में आस्था रखते हैं उनके लिए हनुमानजी ने विशेष रूप से एक संदेश दिया है l
यदि आप रामायण का पाठ करते हैं और हनुमान चलीसा भी आपकी पूजा का प्रमुख अंग है तो आपके चारो तरफ ईश्वरमयी तरंग उपस्थित हैं
" #ॐ #हनुमन्ते #नमः "मंत्र के प्रभाव सॆ हनुमानजी इसका ज्ञान आपके मन में गहराई सॆ उतार देंगे l आपके अन्तर्मन की गहराई में रामायण एक अनुभव के रूप में प्रगट होगी l आपके अन्दर बहुत ही गहराई में आपकी अपनी रामायन पूर्ण रूप सॆ जीवित हो उठेगी l पृथ्वी पर घटित रामायण का हमारे आन्तरिक और बहरी
जीवन से बहुत गहरा संबन्ध है l रामायण हमारे #जीवन की #वास्तविकता का #प्रतिबिम्ब है l हम उसे #ईश्वर समझ कर पूजते हैं परन्तु अपने जीवन में नहीं उतारते हैं और न ही उसको अपने अस्तित्व से जोड़ते हैं ,न कभी हम रामायण में छिपे अपने अस्तित्व को देख पाते हैं और न ही उसके माध्यम सॆ अपने असली ईश्वरीय तत्व और अस्तित्व को खोज पाते हैं l
इसलिए हनुमानजी ने वरदान स्वरूप हमारे लिए #चमत्कारिक मंत्र दिया है इसमें हनुमान जी का आशीर्वाद और सारी शक्तियॉ प्राण बन कर बसी हैं और #ॐ #हनुमन्ते #नमः "मंत्र का जप करने से रामायण में छिपी अस्तित्व आपके ह्रदय में धड़कन बन कर उतर जायेगा l अपनी हर धड़कन में आपको ईश्वर की उपस्थिति का अद्भुत अनुभव प्राप्त होगा l
ॐ हनुमन्ते नमः " ॐ हनुमन्ते नमः " ॐ हनुमन्ते नमः " " जय श्री राम" " #जय #श्री #राम"" #जय #श्री #राम" l
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आध्यात्मिक जानकारी हेतु चैनल को सस्क्राइब करें ।

सुश्री उमा भारती जी ,श्री राजीव प्रताप रुडी जी, श्री लक्ष्मनाचार्य जी,पँ०हिमांशु मिश्र, श्री संजय मयूख आदि,#माँ #अम्बिका #भवानी #कथा #पुस्तक का #विमोचन ।
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. 🌺 #श्री #हनुमत #कवच 🌺

हनुमान पूर्वत: पातु दक्षिणे पवनात्मज:।
पातु प्रतीच्यां रक्षोघ्न: पातु सागरपारग:॥1॥
उदीच्यामर्ध्वत: पातु केसरीप्रियनन्दन:।
अधस्ताद् विष्णुभक्तस्तु पातु मध्यं च पावनि:॥2॥
लङ्काविदाहक: पातु सर्वापद्भ्यो निरन्तरम्।
सुग्रीवसचिव: पातु मस्तकं वायुनन्दन:॥3॥
भालं पातु महावीरो भु्रवोर्मध्ये निरन्तरम्।
नेत्रे छायापहारी च पातु न: प्लवगेश्वर:॥4॥
कपोलौ कर्णमूले तु पातु श्रीरामकिङ्कर:।
नासाग्रमञ्जनीसूनु पातु वक्त्रं हरीश्वर:।
वाचं रुद्रप्रिय: पातु जिह्वां पिङ्गललोचन:॥5॥
पातु देव: फालगुनेष्टश्चिबुकं दैत्यदर्पहा।
पातु कण्ठं च दैत्यारि: स्कन्धौ पातु सुरार्चित:॥6॥
भुजौ पातु महातेजा: करौ च चरणायुध:।
नखान्नखायुध: पातु कुक्षिं पातु कपीश्वर:॥7॥
वक्षो मुद्रापहारी च पातु पार्श्वे भुजायुध:।
लङ्काविभञ्जन: पातु पृष्ठदेशं निरन्तरम्॥8॥
नाभिं च रामदूतस्तु कटिं पात्वनिलात्मज:।
गुह्यं पातु महाप्राज्ञो लिङ्गं पातु शिवप्रिय:॥9॥
ऊरू च जानुनी पातु लङ्काप्रासादभञ्जन:।
जङ्घे पातु कपिश्रेष्ठो गुल्फौ पातु महाबल:।
अचलोद्धारक: पातु पादौ भास्करसन्निभ:॥10॥
अङ्गानयमितसत्त्वाढय: पातु पादाङ्गुलीस्ति।
सव्रङ्गानि महाशूर: पातु रोमाणि चात्मवित्॥11॥
हनुमत्कवचं यस्तु पठेद् विद्वान् विचक्षण:।
स एव पुरुषश्रेष्ठो भुक्तिं च विन्दति॥12॥
त्रिकालमेककालं वा पठेन्मासत्रयं नर:।
सर्वानृरिपून् क्षणााित्वा स पुमान् श्रियमाप्नुयात्॥13॥
मध्यरात्रे जले स्थित्वा सप्तवारं पठेद्यदि।
क्षयाऽपस्मार-कुष्ठादितापत्रय-निवारणम्॥14॥
अश्वत्थमूलेऽर्क वारे स्थित्वा पठति य: पुमान्।
अचलां श्रियमाप्नोति संग्रामे विजयं तथा॥15॥
बुद्धिर्बलं यशो धैर्य निर्भयत्वमरोगताम्।
सुदाढणर्यं वाक्स्फुरत्वं च हनुमत्स्मरणाद्भवेत्॥16॥
मारणं वैरिणां सद्य: शरणं सर्वसम्पदाम्।
शोकस्य हरणे दक्षं वंदे तं रणदारुणम्॥17॥
लिखित्वा पूजयेद्यस्तु सर्वत्र विजयी भवेत्।
य: करे धारयेन्नित्यं स पुमान् श्रियमाप्नुयात्॥18॥
स्थित्वा तु बन्धने यस्तु जपं कारयति द्विजै:।
तत्क्षणान्मुक्तिमाप्नोति निगडात्तु तथेव च॥19॥

#प्रतिदिन #सुबह-#शाम #हनुमत #कवच #जपने #से #मनुष्य #सुखी #बना #रहता #है। #उसके #सारे #शत्रु #दूर #भाग #जाते है। #यह #कवच #भगवान #राम #द्वारा #रचा #और #पढ़ा #गया #है !!
. पँ०हिमांशु मिश्र,
. 7739792520,
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💐💐 #मधुराष्टकं 💐💐

#मधुराष्टकं की रचना #पुष्टिमार्ग के #प्रवर्तक और #महान #वैश्न्वाचार्य #श्री #वल्लभाचार्यजी ने की थी।
यह एक अत्यन्त #सुंदरस्तोत्र है, जिसमें #मधुरापति #भगवान् #कृष्ण के #सरस और #सर्वांग #सुंदररूप और #भावों का #वर्णन है। मधुराष्टकं मूल रूप से #संस्कृत में #रचित है।
मधुराष्टकं में आठ पद हैं और हर पद में मधुरं शब्द का आठ बार प्रयोग किया गया है।*
ऐसा स्वाभाविक भी है क्योंकि कृष्ण साक्षात् माधुर्य और मधुरापति हैं।
किसी भक्त ने कहा है कि यदि मेरे समक्ष अमृत और श्रीकृष्ण का माधुर्य रूप हो तो मैं श्रीकृष्ण का माधुर्य रूप ही चाहूँगा, क्योंकि अमृत तो एक बार पान करने से समाप्त हो जाएगा लेकिन भगवान् का माधुर्य रूप तो निरंतर बढ़ता ही जाएगा। भगवान् के माधुर्य रूप की ऐसी महिमा है।

💐अधरं मधुरं वदनं मधुरं, नयनं मधुरं हसितं मधुरं।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं॥१॥

#भावार्थ :- आपके होंठ मधुर हैं, आपका मुख मधुर है, आपकी ऑंखें मधुर हैं, आपकी मुस्कान मधुर है, आपका हृदय मधुर है, आपकी चाल मधुर है, मधुरता के ईश श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है॥१॥

💐वचनं मधुरं चरितं मधुरं, वसनं मधुरं वलितं मधुरं ।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं॥२॥

#भावार्थ :- आपका बोलना मधुर है, आपके चरित्र मधुर हैं, आपके वस्त्र मधुर हैं, आपका तिरछा खड़ा होना मधुर है, आपका चलना मधुर है, आपका घूमना मधुर है, मधुरता के ईश श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है॥२॥

💐वेणुर्मधुरो रेनुर्मधुरः, पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं॥३॥

#भावार्थ :- आपकी बांसुरी मधुर है, आपके लगाये हुए पुष्पमधुर हैं, आपके हाथ मधुर हैं, आपके चरण मधुर हैं, आपका नृत्य मधुर है, आपकी मित्रता मधुर है, मधुरता के ईश श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है॥३॥

💐गीतं मधुरं पीतं मधुरं, भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरं।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं॥४॥

#भावार्थ :- आपके गीत मधुर हैं, आपका पीना मधुर है, आपका खाना मधुर है, आपका सोना मधुर है, आपका रूप मधुर है, आपका टीका मधुर है. मधुरता के ईश श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है॥४॥

💐करणं मधुरं तरणं मधुरं, हरणं मधुरं रमणं मधुरं।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलंमधुरं॥५॥

#भावार्थ :- आपके कार्य मधुर हैं, आपका तैरना मधुर है, आपका चोरी करना मधुर है, आपका प्यार करना मधुर है, आपके शब्द मधुर हैं, आपका शांत रहना मधुर है, मधुरता के ईश श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है॥५॥

💐गुंजा मधुरा माला मधुरा, यमुना मधुरा वीचीर्मधुरा।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं॥६॥

#भावार्थ :- आपकी घुंघची मधुर है, आपकी माला मधुर है, आपकी यमुना मधुर है, उसकी लहरें मधुर हैं, उसका पानी मधुर है, उसके कमल मधुर हैं, मधुरता के ईश श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है॥६॥

💐गोपी मधुरा लीला मधुरा, युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरं।
दृष्टं मधुरं सृष्टं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं॥७॥

#भावार्थ :- आपकी गोपियाँ मधुर हैं, आपकी लीला मधुर है,आप उनके साथ मधुर हैं, आप उनके बिना मधुर हैं,आपका देखना मधुर है, आपकी शिष्टता मधुर है, मधुरता के ईश श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है॥७॥

💐गोपा मधुरा गावो मधुरा, यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा।
दलितं मधुरं फ़लितं मधुरं, मधुराधिपते रखिलं मधुरं॥८॥*

#भावार्थ :- आपके गोप मधुर हैं,आपकी गायें मधुर हैं, आपकी छड़ी मधुर है, आपकी सृष्टि मधुर है, आपका विनाश करना मधुर है, आपका वर देना मधुर है, मधुरता के ईश श्रीकृष्ण आपका सब कुछ मधुर है॥८॥

. #पँ०हिमांशु #मिश्र,
. 7739792520,
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🌅 #फाल्गुनमास में #विष्णु #सूर्य का #ध्यान 🌅

#विष्णुरश्वतरो #रम्भा #सुर्यवर्चाश्र्च #सत्यजित् l
#विश्वामित्रो #महाप्रेत #उर्जमासं #नयन्त्यमी l l
#भानुमण्डलमध्यस्थं #वेदत्रयनिषेवितम् l #गायत्रीप्रतिपाद्यं #तं #विष्णुं #भक्त्या #नमाम्यहम् l l

फाल्गुन मास में (आदित्य )सूर्य के साथ उनके रथ पर विश्र्वामित्र ऋषि,रम्भा अप्सरा,सुर्यवाचां गन्धर्व,सत्यजित यक्ष,अश्र्वतर नाग तथा महाप्रेत राक्षस रहते हैं l ऐसे भानुमण्डलके मध्य में स्थित,तीनों वेदोंद्वारा सेवित तथा गायत्रीद्वारा प्रतिपाद्य विष्णु आदित्य् को मैं भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ l विष्णु आदित्य छः सहस्त्र रश्मियों से तपते हैं,उनका वर्ण अरुण है l फाल्गुनके सूर्य का नाम हैं --विष्णु l पराशरजी के अनुसार विष्णु का अर्थ है --रक्षक,विश्वव्यापक l यह सम्पूर्ण विश्व उन परमात्मा की शक्ति से व्याप्त है;अतः वे विष्णु कहलाते हैं,क्यों कि विश धातु का अर्थ है --प्रवेश करना l फाल्गुन मास में पहुँचते-पहुँचते सूर्य शक्तिसम्पन्न होजाते हैं l वह ठण्डसे सिकुड़ी हुई सृष्टिमें शक्ति का संचार करते हैं l उनकी उत्पादक शक्ति प्रखर होजाती है l इस प्रकार एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति की भाँति विष्णु आदित्य सृष्टिके पालन की भूमिका को सम्पन्न करते हैं l देवताओं के शत्रुओं का संहार करने वाले तथा समस्त सृष्टिका पालन करने वाले भगवान विष्णु वास्तवमें सूर्यके ही अवतार हैं l इन्हें ही द्वादशादित्यों में विष्णु कहा जाता है l

जो मनुष्य फाल्गुन मास में भगवान विष्णु रूप सूर्य₹ का पूजा-अर्चना अथवा स्त्रोत्र का पाठ करता है उसे अनेकानेक लाभ प्राप्त होते हैं l जय भगवान भास्कर l
. 💗 #सूर्याष्टकं 💗
" आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर l दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोस्तुते ll
सप्ताश्र्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् l श्र्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
लोहितं रथमारुढं सर्वलोकपितामहम् l महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् l महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
बृंहितं तेजः पुञ्जं च वायुमाकाशमेव च l
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् l एकचक्रधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
तं सूर्य जगतकर्तारं महातेजः प्रदीपनम् l महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
तं सूर्य जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् l महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ll
इति श्री शिवप्रोक्तं सूर्याष्टकं सम्पुर्णम् "

. #पँ०हिमांशु #मिश्र,
. 7739792520.
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. 🕉 #आदित्यहृदय #स्तोत्र 🕉

. 🌺 #विनियोग 🌺
ॐ अस्य आदित्यह्रदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषि: अनुष्टुप्छन्दः आदित्यह्रदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः !!

. 🔔 #पूर्व #पिठिता 🔔

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ ।
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ ।
येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ ।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥

सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥

. 🍀 #मूल -#स्तोत्र 🍀
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ ।
पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: ।
एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: ।
महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: ।
वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥

आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥

हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥

हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥

आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:।
कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥

नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: ।
नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: ।
नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥

नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ ।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥

अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।
एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥ धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ ।
त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ ।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥

. 🌷 #अथ 🌷 रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।

निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥

. ।। #सम्पूर्ण ।।

. : = #अनुवाद = :

{ 1,2 .} उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिंता करते हुए रणभूमि में खड़े हुए थे । इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया । यह देख भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले ।

{ 3 }सबके ह्रदय में रमन करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो ! वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे ।

{ 4,5 } इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है ‘आदित्यहृदय’ । यह परम पवित्र और संपूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है । इसके जप से सदा विजय कि प्राप्ति होती है । यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है । सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है । इससे सब पापों का नाश हो जाता है । यह चिंता और शोक को मिटाने तथा आयु का बढ़ाने वाला उत्तम साधन है ।

{ 6 } भगवान् सूर्य अपनी अनंत किरणों से सुशोभित हैं । ये नित्य उदय होने वाले, देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान नाम से प्रसिद्द, प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी हैं । तुम इनका रश्मिमंते नमः, समुद्यन्ते नमः, देवासुरनमस्कृताये नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराये नमः इन मन्त्रों के द्वारा पूजन करो।

{ 7 } संपूर्ण देवता इन्ही के स्वरुप हैं । ये तेज़ की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं । ये अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित समस्त लोकों का पालन करने वाले हैं ।

8,9 ये ही ब्रह्मा, विष्णु शिव, स्कन्द, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर , वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रकाश के पुंज हैं ।

10,11,12,13,14,15 इनके नाम हैं आदित्य(अदितिपुत्र), सविता(जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य(सर्वव्यापक), खग, पूषा(पोषण करने वाले), गभस्तिमान (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश्य, भानु(प्रकाशक), हिरण्यरेता(ब्रह्मांड कि उत्पत्ति के बीज), दिवाकर(रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व, सहस्रार्चि(हज़ारों किरणों से सुशोभित), सप्तसप्ति(सात घोड़ों वाले), मरीचिमान(किरणों से सुशोभित), तिमिरोमंथन(अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू, त्वष्टा, मार्तण्डक(ब्रह्माण्ड को जीवन प्रदान करने वाले), अंशुमान, हिरण्यगर्भ(ब्रह्मा), शिशिर(स्वभाव से ही सुख प्रदान करने वाले), तपन(गर्मी पैदा करने वाले), अहस्कर, रवि, अग्निगर्भ(अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख, शिशिरनाशन(शीत का नाश करने वाले), व्योमनाथ(आकाश के स्वामी), तमभेदी, ऋग, यजु और सामवेद के पारगामी, धनवृष्टि, अपाम मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विंध्यवीथिप्लवंगम (आकाश में तीव्र वेग से चलने वाले), आतपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल(भूरे रंग वाले), सर्वतापन(सबको ताप देने वाले), कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्ति के कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन(जगत कि रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी और द्वादशात्मा हैं। इन सभी नामो से प्रसिद्द सूर्यदेव ! आपको नमस्कार है

{ 16 } पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है । ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है ।

{ 17 } आप जयस्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता हैं । आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं । आपको बारबार नमस्कार है । सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्य ! आपको बारम्बार प्रणाम है । आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से भी प्रसिद्द हैं, आपको नमस्कार है ।

{ 18 } उग्र, वीर, और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है । कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तण्ड को प्रणाम है ।

{19 } आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी है । सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाली अग्नि आपका ही स्वरुप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है ।

{ 20 } आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं । आपका स्वरुप अप्रमेय है । आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, संपूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है ।

{ 21 } आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरी और विश्वकर्मा हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है

{ 22 } रघुनन्दन ! ये भगवान् सूर्य ही संपूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं । ये अपनी किरणों से गर्मी पहुंचाते और वर्षा करते हैं ।

{ 23 } ये सब भूतों में अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं । ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं ।

{ 24 } देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं । संपूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं ।

{ 25} राघव ! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता ।

{ 26 } इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर कि पूजा करो । इस आदित्यहृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे ।

{ 27 } महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे । यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे वैसे ही चले गए ।
28,29,30 उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया । उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान् सूर्य की और देखते हुए इसका तीन बार जप किया । इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ । फिर परम पराक्रमी रघुनाथ जी ने धनुष उठाकर रावण की और देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढे । उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया ।

{31} उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान् सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की और देखा और निशाचरराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा – ‘रघुनन्दन ! अब जल्दी करो’ ।

इस प्रकार #भगवान्सूर्य कि प्रशंसा में कहा गया और #वाल्मीकि #रामायण #के #युद्ध #काण्ड #में #वर्णित #यह #आदित्य #हृदयम #मंत्र #संपन्न #होता #है ।।
जो मनुष्य द्वादश रविबार को इस मंदिर में #सूर्याआदित्यहृदयस्तोत्र
का पाठ करता है उन्हें #रोग-#दुःख , #क्लेश तथा #अनेको #कष्टों से छूट कर इस लोक में अनेक सुखों की प्राप्ति उपरान्त सूर्यलोक में #मोक्ष की #प्राप्ति होती है ।
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. #देव #सूर्यमन्दिर-#औरँगाबाद,
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🌅 #स्तवराज #मन्त्र 🌄

#भगवानसूर्य #ने #श्रीकृष्ण #पुत्र #साम्ब #को #अपने 21 #नाम #बताये #जो ‘#स्तवराज’ के #नाम से भी #जाने #जाते हैं–

ॐ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रवि:।
लोकप्रकाशक: श्रीमान् लोकचक्षुर्महेश्वर:।।
लोकसाक्षी त्रिलोकेश: कर्ता हर्ता तमिस्त्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचि: सप्ताश्ववाहन:।।
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृत:।। ( *भविष्यपुराण* )

#भगवानसूर्य के ये 21 #नाम हैं–*
विकर्तन (विपत्तियों को नष्ट करने वाला)विवस्वान् (प्रकाशरूप)मार्तण्डभास्कररविलोकप्रकाशकश्रीमान्लोकचक्षुग्रहेश्वरलोकसाक्षीत्रिलोकेशकर्ताहर्तातमिस्त्रहा (अन्धकार को नष्ट करने वाले)तपनतापनशुचि (पवित्रतम)सप्ताश्ववाहन (जिनका वाहन सात घोड़ों वाला रथ है)गभस्तिहस्त (किरणें ही जिनके हाथ हैं)ब्रह्मासर्वदेवनमस्कृत।

भगवान सूर्य के आदेश से साम्ब इक्कीस नामों का पाठ करने लगे। उनकी भक्ति और तप से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उनका रोग दूर कर दिव्य रूप प्रदान किया।

जो मानव प्रत्येक दिन उपरोक्त मन्त्र का पाठ करेगा,उसे रोग,शोक,दुःख एवं अनेक कष्टों से मुक्ति प्राप्त हो जाएगी ।
. *जय भाष्कर*
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